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बेबाक़-पटना की जरूरत पुलिस कमिश्नर सिस्टम , आखिर क्या है पुलिस कमिश्नर प्रणाली? समझिए

कानून व्यवस्था को मजबूत करने के लिये सुशासन सरकार को अब पटना में पुलिस कमिश्नरी व्यवस्था को लागू करना ही चाहिए ताकि महानगर की शक्ल अख्तियार करते इस शहर को किया जा सके सुरक्षीत

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पटना Live डेस्क। बिहार में सुशासन यानी कानून का राज के दावों के बीच बीते सालों में सूबे में कानून व्यवस्था, अपराध नियंत्रण के साथ-साथ बेहतर पुलिसिंग के फ्रंट पर नीतीश सरकार लगातार फेल होती नजर आ रही है। तमाम प्रयासों और पुलिस महकमे में तबादलो के बावजुद सूबे में अपराध का ग्राफ लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है।हद तो ये की राजधानी पटना में सरकार की नाक के नीचे अपराधियों के कहर ने आम आदमी को हलकान कर दिया है।

तेजी से शहर का लगातार बढ़ता रकबा (क्षेत्रफल) और आबादी ने पटना को महानगर की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। इधर, तमाम नागरिक सुविधाओं से लैस करने की कवायद भी जोरशोर से जारी है। मेट्रो निर्माण की प्रक्रिया भी धीरे धीरे ही सही पर शुरू हो गई है। भविष्य को देखते हुए सरकार अब कमिश्नर प्रणाली के सहारे सब कुछ ठीक करने की कवायद शुरू कर देनी चाहिए। यह समय की जरूरत और माँग भी है। नीतीश सरकार को इस नई व्यवस्था का प्रारूप तय करने के लिए मंथन का दौर भी शुरू कर देना चाहिए। सरकार को प्रयोग के तौर पर ही सही पर राजधानी में कमिश्नर प्रणाली को लागू करना ही चाहिए। आप सोच रहे होंगे आखिर कमिश्नर प्रणाली में ऐसा क्या है की इसकी वक़ालत की जा रही है और समय की मांग भी है। आइए आपको बताते है कैसे बेहतर होगी कमिश्नर प्रणाली से पुलिसिंग और कानून व्यवस्था? क्यों कमिश्नर प्रणाली देश के 100 से अधिक बड़े महानगरों में सफल और प्रभावी है।

क्या है कमिश्नर प्रणाली ?

कमिश्नर प्रणाली लागू होने पर पुलिस के अधिकार बढ़ जाएंगे और वह अधिक ताकतवर हो जाएगी।कानून व्यवस्था से जुड़े तमाम मुद्दों पर पुलिस कमिश्नर ही निर्णय ले सकेगा। जिले के डीएम के पास अटकी रहने वाली तमाम अनुमति की फाइलों का झंझट खत्म हो जाएगा।

                इस प्रणाली में एसडीएम और एडीएम को दी गई एग्जीक्यूटिव मजिस्टेरियल पावर पुलिस को मिल जाएंगी।यानी पुलिस शांतिभंग की आशंका में निरुद्ध करने से लेकर गुंडा एक्ट,गैंगस्टर एक्ट और रासुका लगाने में सक्षम हो जाएगी। इन सभी कार्रवाई के लिए डीएम की परमिशन का झंझट खत्म कर कमिश्नर इस पर फैसला ले सकेंगे।

और ताकतवर हो जाएगी पुलिस

अगर कानूनी भाषा में कहे तो सीआरपीसी की मजिस्ट्रियल पावर वाली जो कार्यवाही अब तक जिला प्रशासन प्रशासन के अफसरों के पास होते है, वह सभी मजिस्टेरियल पावर पुलिस कमिश्नर को मिल जाएंगे।यानी सीआरपीसी (CRPC) में 107-16, धारा 144, 109, 110, 145 के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी पुलिस को मिल जाएंगी।

            होटल के लाइसेंस,बार के लाइसेंस,हथियार के लाइसेंस देने का अधिकार भी पुलिस के पास आ जाएगा। धरना प्रदर्शन की अनुमति देना ना देना भी पुलिस तय करेगी। दंगे के दौरान लाठी चार्ज होगा या नहीं, कितना बल प्रयोग होगा यह भी पुलिस तय करेगी।

ज़मीनी विवाद का फैसला 

वर्तमान दौरन में राजधानी में ज़मीनी की बढ़ती कीमत ने इससे जुड़े आपराधिक और फर्जीवाड़े के बढ़ते मामले ने कानून व्यवस्था की समस्याएं खड़ी करने में अहम भूमिका निभाना शुरू कर दिया है। कमिश्नर सिस्टम लागू होने पर जमीन की पैमाइश से लेकर जमीन संबंधी विवादों के निस्तारण में भी पुलिस को अधिकार मिलेगा। पुलिस सीधे लेखपाल को पैमाइश करने का आदेश देगी। हत्या मारपीट आगजनी बलवा जैसे तमाम घटनाएं जमीनी विवाद से शुरू होती हैं। कमिश्नर प्रणाली लागू होने से पुलिस ऐसे विवादों का जल्द निस्तारण कर सकेगी।

अतिक्रमण पर भी लगेगा अंकुश

कमिश्नर प्रणाली से शहरी इलाके में अतिक्रमण पर भी अंकुश लगेगा।अतिक्रमण अभियान चलाने का सीधे आदेश कमिश्नर देगा और नगर निगम को उस पर अमल करना होगा।।इस तरह राजधान की सबसे बड़ी समस्या अतिक्रमण जो अमूमन भीषण ट्रैफिक जाम की वजह है से निजात मिलने की संभावना बहुत हद तक बढ़ जायेगा।

पुलिस पर निरंकुश होने का खतरा

इन तमाम खूबियों के बीच इस प्रणाली से पुलिस के निरंकुश होने का भी खतरा होगा। घूसखोरी और भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रही बिहार पुलिस के लिए कमिश्नर प्रणाली दो धारी तलवार की तरह होगी।

दरअसल सुशासन सरकार की भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति को भी इस प्रणाली के जरिए काफी मदद मिलेगी। लेकिन ऐसे में जब पुलिस के पास वसूली के अधिकार होंगे तो पुलिस में भ्रष्टाचार के और अधिक बढ़ने का खतरा भी मंडरा आएगा। लेकिन पुलिस को बेहतर समझनेवाले और कमिश्नर प्रणाली की पैरवी करने वाली प्रकाश सिंह कमेटी हो या फिर सुलखान सिंह कमेटी की सिफारिशें, सभी ने एक आईजी स्तर के अफसर के हाथों में जिले की कमान और फिर डीसीपी और ज्वाइंट कमिश्नर के पदों पर भी डीआईजी रैंक के अफसरों की तैनाती इन अफसरों के अनुभव और साख से पुलिस के भ्रष्टाचार का खतरा कम होगा।

इन कमेटी द्वारा दलील दी कि जब अफसर 15-20 साल के अनुभव वाला अफसर जिले की कमान संभालेगा तो उसके अनुभव का लाभ पुलिसिंग में होगा। साथ ही बेदाग करियर की चिंता में अफसर खुद भी भ्रष्टाचार में शामिल नहीं होगा। जिसका उदाहरण दिल्ली, मुंबई बैंगलुरू, हैदराबाद जैसे शहरों में चल रही कमिश्नर प्रणाली उदाहरण है।

प्रयोग के तौर पर ही सही पर बिहार सरकार के लिए कमिश्नर प्रणाली लागू करना आसान भी नहीं होगा। सरकार को सर्वप्रथम तो यह तय करना होगा कि अगर पटना पुलिस की कमान आईजी रैंक के अफसर को दी जाएगी तो इलाके के अपर पुलिस अधीक्षक और डीएसपी की कमान डीआईजी और एसपी स्तर के अफसरों को मिलेगी या फिर सिर्फ पद नाम बदलकर,कमिश्नर प्रणाली के अधिकार देकर यह व्यवस्था लागू की जाएगी। ऐसे तमाम सवाल है जिनसे बिहार सरकार को जूझना होगा, लेकिन कहते है न भविष्य को देखते हुए अगर फैसले लिए जाए तो वर्त्तमान के संकट से भी निज़ात मिल सकती है।

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