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‘मौनी सप्ताह’ मनाने वाले बीजेपी सांसद के बारे में ‘अजीत अंजुम’को बहुत क्यूरोसिटी हो रही है बोले कसम से

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पटना Live डेस्क। जब से बीजेपी के सांसद आरके सिन्हा के मौनव्रत का वीडियो देखा है, तब से सिन्हा साहब के बारे में जानने की बहुत क्यूरोसिटी हो रही है। कसम से। बहुत ज्यादा।सिन्हा साहब ने अपने मौन से ‘पैराडाइज पेपर्स‘ के सवालों का ऐसा संहार किया है कि रिपोर्टर अब ‘मौनी सप्ताह’ के खात्मे तक न तो उनका पीछा कर पाएंगे,न ही कैमरे पर उनके दो शब्द पाएंगे।

जानने का मन हो रहा है कि सिन्हा साहब ने कल कैमरे वाले रिपोर्टर को मौनव्ररत का पर्चा थमाने के बाद से क्या -क्या किया?

‘पैराडाइज पेपर्स‘ में नाम आने के बाद घर जाकर ऐसे ही मौन साधे रहे?

बेटे और परिवार वालों से हर बात क्या पर्ची लिखकर ही करते रहे?

क्या वो मौन के इतने बड़े साधक हैं कि हर तूफान को अपने मौन से निगल लेने की क्षमता रखते हैं?

सांसद का नाम आने पर पार्टी के किसी बड़े नेता ने फोन किया या नहीं?

अगर किसी बड़े नेता ने फोन किया होगा तो सिन्हा साहब ने कैसे जवाब दिया होगा?

क्या बड़े नेता एक तरफ फोन पर होंगे और दूसरी तरफ से कोई घरवाला सिन्हा साहब की पर्ची पढ़कर सुना रहा होगा?

या कि बड़े नेताओं ने भी मान लिया होगा कि सात दिन बाद ही सिन्हा साहब से बात होगी?

क्या सिन्हा साहब कुछ नेताओं के पास जाकर अपना पक्ष पर्ची में लिखकर दे आए होंगे?

क्या सिन्हा साहब ने वकीलों से भी पर्ची के जरिए ही संवाद किया होगा? या आगे करेंगे?

ऐसे दर्जनों सवाल मेरे मन में कल से कौंध रहे हैं। बीजेपी सांसद आरके सिन्हा ने तो रिपोर्टर के सवाल के जवाब में आठ शब्द लिखकर दे दिया कि ‘सात दिन के भागवत यज्ञ में मौनव्रत है’, लेकिन ये सात दिन बीतेंगे कैसे? सिन्हा साहब का भी और उनका भी जो उनसे कुछ पूछना चाहते हैं। हो सकता है कि इन सात दिनों में वकीलों के दस्ते के सहयोग से सिन्हा साहब ‘पैराडाइज पेपर्स‘ से बचने की कई पतली गलियां तलाश लें, तब बोलें? किसी त्रासदी, हादसे या किसी की मौत की दुखद खबर पर दो मिनट का मौन रखने की परंपरा के हम सब साक्षी रहे हैं।ऐसे मौन के सहभागी भी रहे हैं।फिर ये मौन तो व्रत की शक्ल में है।सात दिन के लिए है।वजह धार्मिक है।भागवत यज्ञ है। वैसे भी बीजेपी नेता तो भागवत की ही सुनते हैं। निराकार भागवत हों या साकार। सिन्हा जी के लिए इस यज्ञ के फायदे हैं। एक भागवत के लिए मौन रखने के क्रम में दूसरे भागवत को साधकर अपना खूंटा और मजबूत कर सकते हैं,ताकि कोई हिला न सके।तो हो सकता है कि सिन्हा साहब पहले अपना खूंटा मजबूत करें फिर मौन तोड़ें ..

गांधीजी के बारे में बहुत सुना-पढ़ा है कि वो भी जब मौनव्रत रखते थे तो लिखकर अपनी बात कहा करते थे। कई बार उन्होंने मौनव्रत में रहते हुए इंटरव्यू भी दिया था -लिखित।उनका नाम तब किसी ‘पैराडाइज पेपर्स‘ में नहीं आया था तो उनके मौन को कोई चुनौती देने वाला नहीं था।अन्ना हजारे भी मौनव्रत रखते हैं। 2011 में अन्ना ने दिल्ली में 19 दिन का मौनव्रत रखा था। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने दिल्ली आए अन्ना ने जब मौनव्रत तोड़ा तो पहला शब्द बोला -भारत माता की जय।सिन्हा साहब अगर वाकई सात दिन तक सारे झंझावातों और मीडिया के शोर-शराबों को झेलकर अपने मौन पर कायम रह गए तो सातवें दिन मौन टूटने पर उनका पहला शब्द क्या होगा? किससे होगा ? कायदे से तो उनके मौन टूटने पर पहला हक तो उसी रिपोर्टर का बनता है, जिसने उनसे ‘पैराडाइज पेपर्स‘ पर पहला सवाल पूछा था। कम से कम उस रिपोर्टर को सात दिन पहले पूछे गए सवाल का जवाब तो एक्सक्लूसिव मिले।

 

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