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ट्रिपल तलाक-शाह बानो से लेकर शायरा बानो तक

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पटना Live डेस्क. ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है. मुस्लिम महिलाओं के लिए ट्रिपल तलाक का मुद्दा कोई नया मुद्दा नहीं है. 1980 के दशक में भी इसे खत्म करने की मांग हुई थी लेकिन मुस्लिम महिलाओं की वो मांग राजनीतिक और सामाजिक दबाव के चलते दबा दी गई थी. हम आपको उस इतिहास की जानकारी देना चाहते हैं जब ट्रिपल तलाक के मुद्दे ने जोर पकड़ा और यह मामला कोर्ट तक पहुंच गया. जब भी इस मुद्दे की चर्चा होगी तब-तब मुस्लिम महिला शाह बानो का नाम सबसे पहले आएगा. शाह बानो ही वो पहली महिला थी जिसने इस मुद्दे को कोर्ट के दरवाजे तक पहुंचाया. तीन तलाक के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली इस महिला के नाम पर ही इस मामले का नाम ‘शाह बानो केस’ पड़ा. मोहम्मद अहमद खान के खिलाफ शाह बानो की ओर से दायर की गई यह याचिका इस देश की करोड़ों मुस्लिम महिलाओं के अधिकार से जुड़ा है. मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली शाह बानो को 60 साल की उम्र में उसके पति मोहम्मद अहमद खान ने तलाक दे दिया था. तलाक के वक्त शाह बानो के पांच बच्चे थे. इन बच्चों के भरण-पोषण के लिए शाह बानो ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और पति से भत्ता दिलाने की गुजारिश की. निचली अदालत ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया. हालांकि उसके पति के अपील के चलते यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया.  सन 1980 के दशक में मुस्लिम समाज के लगभग सारे पुरुष शाह बानो की अपील के खिलाफ थे. शायद इसी का ख्याल करते हुए तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला अधिनियम पारित कर दिया. इसके आधार पर शाह बानो के पक्ष में सुनाया गया फैसला कोर्ट ने पलट दिया. कोर्ट ने जब शाह बानो के पति मोहम्मद अहमद खान से पूछा कि आखिर वे भरण-पोषण भत्ता क्यों नहीं देना चाहते हैं? इसके जवाब में अहमद खान ने कहा, ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाकशुदा महिलाओं को ताउम्र भरण-पोषण भत्ता दिए जाने का कोई प्रावधान नहीं है.’

वहीं शाह बानो के वकील ने तर्क दिया, ‘दंड प्रक्रिया संहिता देश के प्रत्येक नागरिक पर सामान रूप से लागू होती है, ऐसे में वह भी भरण-पोषण भत्ते की हकदार हैं.’  कोर्ट ने शाह बानो की दलील को मानते हुए 23 अप्रैल 1985 को उनके पक्ष में फैसला दे दिया. मुस्लिम धर्म गुरुओं ने इस फैसले के विरोध में आवाज बुलंद कर दी. भारी दबाव के चलते तत्कालीन राजीव गांधी सरकार को मुस्लिम महिला अधिनियम पारित करना पड़ा. इस कारण शाह बानो जीतकर भी हार गईं.
साल 2001 में सुप्रीम कोर्ट में डेनियल लतीफी का मामला आया था. कोर्ट ने शाह बानो के 16 साल पुराने मामले को आधार मानते हुए तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के लिए भत्ता सुनिश्चित कर दिया.
उसके बाद इस मामले ने शायरा बानो की अर्जी के बाद जोर पकड़ा. उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो का निकाह साल 2002 में इलाहाबाद के रिजवान अहमद से हुई थी. ससुराल वालों की दहेज प्रताड़ना, फिर पति के तलाक देने के बाद शायरा बानो कोर्ट पहुंचीं. आरोप है कि पति शायरा बानो को लगातार नशीली दवाएं देकर याददाश्त कमजोर कर दिया और साल 2015 में मायके भेजकर तलाक दे दिया था. तलाक के बाद शायरा बानो कोर्ट चली गई दरअसल, शायरा बानो ने तीन तलाक के खिलाफ कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की थी. इस पर शायरा का तर्क था कि तीन तलाक न तो इस्लाम का हिस्सा है और न ही आस्था.

 

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