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Bihar Election Results-हारे भी लालू जीते भी लालू आखिर कब तक बेचोगे लालू यादव को तुम सुशासन बाबु ?

15 साल और 6 बार CM बनने के बाद भी सुशासन का मुद्दा है सिर्फ जंगलराज और लालू यादव

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पटना Live डेस्क।बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के नतीजे घोषित कर दिए गए है। एनडीए (NDA) 125 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल करने में कामयाब रही,जबकि युवा तेजश्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन को 110 सीटें मिलीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने ट्वीट कर बिहार की जनता का आभार व्यक्त किया है। तो वही नीतीश कुमार ने पीएम नरेंद्र मोदी की ओर से मिल रहे सहयोग के लिए उन्‍हें धन्‍यवाद दिया। सीएम नीतीश ने ट्वीट किया, ”जनता मालिक है।उन्होंने एनडीए को जो बहुमत प्रदान किया, उसके लिए जनता-जनार्दन को नमन है। मैं पीएम नरेंद्र मोदी जी को उनसे मिल रहे सहयोग के लिए धन्यवाद करता हूँ।”

बिहार में लगातार चौथी बार नीतीश कुमार की अत्यंत प्रलयंकारी विकासोन्मुखी सुशासन सरकार जल्द ही सत्ता पर पुनः काबिज हो जाएगी। सम्पन्न विधानसभा चुनाव में आवाम ने प्रीपोल-एलायंस वाली NDA को बहुमत से नवाज़ा है।खैर,जम्हूरीयत की रिवायत यही कहती है और यही रिवाज रहा भी है। यानी नी‍तीश लगातार चौथी बार और कुल जमा 7वीं बार दीपोत्सव के बाद सूबे के 37वें मुख्‍यमंत्री के रूप में शपथ लेकर कार्यभार संभालेंगे।

 सियासी सफर और लालू यादव

इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले कुमार ने जेपी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई, राज्य विद्युत विभाग में नौकरी का प्रस्ताव ठुकरा दिया और सियासी पारी का आगाज करने का फैसला किया। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले आंदोलन में अपने साथ राजनीति में कदम रखने वाले लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान के विपरीत कुमार को लंबे समय तक चुनाव में जीत नहीं मिली। उन्हें 1985 के विधानसभा चुनाव में लोकदल के उम्मीदवार के तौर पर हरनौत विधानसभा सीट से पहली बार सफलता मिली। हालांकि उस चुनाव में कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया था। यह चुनाव इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ महीने बाद हुआ था।

पहली चुनावी जीत के चार साल बाद वह बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित होकर देश की सर्वोच्च पंचायत पहुंचे। यह वही दौर था जब सारण से लोकसभा सदस्य रहे लालू प्रसाद पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। उस वक्त जनता दल के भीतर मुख्यमंत्री के लिए नीतीश ने लालू का समर्थन किया था। फिर महज कुछ वर्षों में लालू प्रसाद बिहार की राजनीति में सबसे ताकतवर नेता के तौर पर उभरे, हालांकि बाद में चारा घोटाले में नाम आने और फिर पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाने के बाद वह विवादों से घिरते चले गए।

कालांतर में अपनी सियासी महत्वाकांक्षा के तहत नीतीश कुमार ने 1994 में ही जनता दल और लालू से अपनी राह अलग कर ली। साथ मिला बड़े समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस का तो समता पार्टी का गठन किया। उनकी समता पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन किया और नीतीश ने एक बेहतरीन सांसद के रूप में अपनी पहचान बनाई तथा अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में बेहद ही काबिल मंत्री के तौर पर छाप छोड़ी। बाद में लालू प्रसाद और शरद यादव के बीच विवाद हुआ। यादव ने अपनी अलग राह पकड़ ली। इसके बाद समता पार्टी का जनता दल के शरद यादव के धड़े में विलय हुआ जिसके बाद जनता दल (यूनाइटेड) वजूद में आया। नाम बदला दल का जद(यू) पर भाजपा का गठबंधन जारी रहा। लालू के साथ शुरू हुआ सियासी सफर अब लालू यादव के सियासी वजूद को मिटाने की भगीरथ प्रयास की शक्ल अख़्तियार कर चुका था।

बिहार में लगातार 3 बार से (लगभग 15 साल-10 महीने मांझी CM रहे काल को छोड़कर) मुख्यमंत्री पद पर नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम (तेजस्वी काल को छोड़ कर) की कुर्सी पर सुशील कुमार मोदी की जोड़ी काबिज़ रही है। यक़ीन मानिए जितना विकसित बिहार को विगत 15 वर्षों में निक्कू सुकु की जोड़ी द्वारा किया गया है, उस कथित विकास का कोई जवाब न तो सुशासन के ज़ाबाज़ों के पास है न तो किसी के और के पास। तभी तो 15 साल के सुशासनी शासन के कथित विकास के दावों व जनसरोकार के लिए विगत पन्द्रह वर्षो में निरंतर लागू किए गए हज़ारों हज़ार योजनाओं की बजाय नीतीश – सुशील की जोड़ी को विधानसभा चुनाव 2020 में भी समर्थन और वोट ख़ातिर बिहार की जनता को लालूयुग और उनके शासन के कथित 15 वर्षो के जंगलराज का डर दिखाना पड़ा। तीन चरणों मे सपन्न विधानसभा चुनाव में राजग गठबन्धन को इस बार भी सुशासन सरकार के कथित विकासगाथा की जगह लालू यादव के नाम को लगातार जपना पड़ा ताकि सत्ता हथियाया जा सके।

विगत तीन दशकों के सूबे की सियासत का तफ़सरा करे तो यही समझ मे आता है कि सूबे की सियासत सिर्फ और सिर्फ लालू प्रसाद यादव के ही इर्द-गिर्द व गोल-गोल घूम रही है। यानी कि वर्ष 1989 से आजतक व अबतक बिहार में लोकतंत्र का उत्सव सिर्फ लालू यादव के सौजन्य से मनाया जा रहा है।मतलब इन वर्षों में चुनावी संग्राम में जीत भी लालू रहे हैं हार भी लालू ही रहे है। बाजार की भाषा मे कहे तो बिहार की सियासी मंडी में बिकता है तो सिर्फ़ और सिर्फ लालू।

लालू नाम केवलं

मतलब समझिए,विगत 3 दशकों में लालू प्रसाद यादव सूबे की सियासत की आत्मा में तब्दील हो गए है। बिहार के यूपी बॉडर के समीप स्थित गोपालगंज जिले के गाँव फुलवारिया की माटी से वाया पटना निकलकर देश के सर्वोच्च पंचायत तक अपने सियासी जौहर का करिश्माई आवरण पहुचाने वाले लालू भले ही वर्त्तमान में रांची में डॉक्टरों और पुलिसिया निगरानी में सज़ावार हो कर दिन गुजार रहे है। लेकिन बिहार की सियासत में आज भी अब भी और विगत तीन दशकों से सबसे ज्यादा असरकारी और प्रभावशाली कोई अज़ीम शख़्सियत है तो वो है सिर्फ और सिर्फ़ लालू प्रसाद यादव।

सूबे की सियासत के अंदुरुनी हालात का सच जब भी टटोलिये तो स्पष्ट हो जाता है कि कथित जंगलराज से मुक्ति के नाम पर बिहार की सत्ता पर नवम्बर वर्ष 2005 में काबिज़ हुए नीतीश कुमार और सुशील मोदी की जोड़ी क्रमशः जदयू व भाजपा के कंधे पर सवार होकर विगत लगभग 15 सालो से निरंतर शासन की बागडोर थामें है पर इन दोनों ख़ातिर सियासी संजीवनी लालू नाम ही तो है। पहली बार वर्ष 2005 के फरवरी महिने में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा-जद (यू) के गठबंधन वाला राजग कुछ सीटों के अंतर से बहुमत के आंकड़े से दूर रह गया। जिसके बाद तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश की जिसको लेकर विवाद भी हुआ। उस वक्त केंद्र में संप्रग की सरकार थी। मनमोहन सिंह की नेतृत्व वाली सरकार के साझीदारों में लालू यादव भी शामिल थे। खैर,पुनः वर्ष 2005 में ही नवम्बर के महीने में हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में राजग की बिहार में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।दावा किया गया कि अब सुुुबे की राजनीति में और से तथाकथित लालूयुग के पटाक्षेप की शुरुआत हो गई है।यानी शुरुआत भी जंगलराज से मुक्ति के नाम हुई और यह दावा किया गया कि सुशासन की शुरुआत हो गई है जंगलराज़ से मुक्ति मिल गई है।

15 साल बाद भी सिर्फ लालू नाम केवलं

वक्त का बेरहम पहिया अपनी पूरी रवानी से आगे बढ़ता रहता है। लेकिन साल 2005 नवम्बर महीने से शुरू हुई राजग की लालूयुग और कथित जंगलराज से मुक्ति और पटाक्षेप की कहानी तब से अब तक जारी है। जबकि प्रथम सुशासन सरकार ने ही ऐलान किया था कि कथित तौर पर सूबे को लालू युग व जंगलराज से मुक्त करा लिया गया है। यानि कि मुक्त हुए 15 साल बीत चुके है। इस दौरान मुक्तिदाता 6 बार मुख्यमत्री पद की शपथ लेकर सुशासन बाबु की उपाधि हासिल कर चुके है।लेकिन वाह! रे सुशासन लगातार चौथी बार भी सत्ता कब्जाने और बिहार के 37वें व लगातार 7वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने ख़ातिर भी नीतीश कुमार को लालू नाम केवलं का ही सहारा लेना पड़ा।

तभी तो ये सवाल जायज़ लगता है – हारे भी लालू जीते भी लालू आखिर कब तक बेचोगे लालू यादव को तुम सुशासन बाबु ?

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