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सेवा भावना से सियासत की खुरदरी ज़मीन तक के सफर में अलका संस्कार और सामाजिक उत्थान की पहरुआ

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पटना Live डेस्क। सेवा व सियासत दोनो शब्द भले ही अलग अलग है उच्चारण अलग है पर दोनो का मकसद और उद्देश्य मानव कल्याण ही हैं। तभी तो ये दोनों शब्द एक दूसरे के पूरक समझने वाली अलका ने समाज के आख़री पायदान पर खड़े लोगो व आबादी को अपने सामाजिक उत्थान की मुहिम का केंद्र बिंदु बनाया है।

अमूमन नाज़ों नखरो और शहजादे की तरह लालन पालन वाले बच्चे बच्चियों को समाज से विमुख पाया जाता है लेकिन बिहार की सियासत में बेहद प्रभावशाली परिवार की लाडली अलका ने अलक ही रुख अख़्तियार किया और ग़रीबो मजलूमों और सामाजिक रूप से पिछड़े समाज की आवाज़ बनने की कवायद में जुट गई। वक्त के मयार और बीतते वक्त के साथ आम लोगो के बीच अलका की मकबूलियत बढ़ती चली गई। बूढ़ी आँखों और मजलूम बदरंग आँखों में उम्मीद की लकीर बन गई। तन मन धन से सेवा भवना से ओतप्रोत होकर उन बाज़बज़ाती नालियों के बीच पलती ज़िंदगियों तक जा पहुची और उनके सपनो उम्मिदो का सहारा बन बैठी।

वर्त्तमान समय मे अलका की रूटीन में शामिल है उन बस्तियों तक पहुचना जहाँ उम्मीदे पल रही है पर सबेरा नही होता संघर्ष की जमीन पर सिर्फ समझौते होते है। इन्ही मुफ़लिसो के बीच अलका ने उत्साह और उम्मीद का संचार किया है।

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