BIG eX-(वीडियो) मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौनशोषण मामले का खौफ़नाक सच-वर्ष 2013 से ही जारी है कोख़ और काया को रौंदने का घिनौना खेल

पटना Live डेस्क। बिहार के मुजफ्फरपुर बालिका गृह के मासूम बच्चियों की सिसकती हुई आवाज़ भले ही अब सूबे की सियासत की चूले हिला रही हो। लेकिन सूबे की नीतीश सरकार कर सुशासन के दावो के ठीक उलट मुजफ्फरपुर बालिका गृह में बच्चियों के साथ होने वाले घिनौने अपराध का सच ज्यो ज्यो बाहर आ रहा है, शासन के माथे पर कलंक की परतें और मोटी हो रही है। वही पटना Live ने सूबे को सन्न और शर्मसार करने ने वाले इस मामले की तहत तक जाने की अपनी मुहिम शुरू की तो धीरे धीरे परत दर परत बेहद चौकाने वाले
और खौफनाक साज़िशों के इस घालमेल के राज़फ़ाश  एक एक कर खुलने लगे।

नाबालिको का नर्क                         बिहार के मुजफ्फरपुर में बालिका गृह में बच्चियों की सुरक्षा और अस्मत पर ज़िंदा गोश्त नोचने वाले गिद्दों की नज़र वर्ष 2013 में ही पड़ गई थी। बकौल एक महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं के वर्ष 2013 में भी यहां की बच्चियों की सुरक्षा को लेकर बहुत हंगामा हुआ था।दरअसल मामले का खुलासा तब हुआ जब यहां की एक लड़की गर्भवती हो गई थी। मामला सामने आने के बाद जमकर बवाल हुआ और तब लड़की का आरोप था कि पैसा लेकर उसे बाहर भेजा जाता है। मामले ने जब जोड़ पकड़ लिया तो बाल संरक्षण आयोग का छापा भी पड़ा था।महिला थाने में कांड संख्या 23/13 के तौर पर दर्ज किया गया। लेकिन सत्ता के गलियारों तक पहुच ,पैसा पैरवी और स्थानीय प्रशासन पर पकड़ की बदौलत मामले के असली गुनहगार साफ साफ बच गये और दो नाइट गार्ड समेत तात्कालिक अधीक्षक पर मामला दर्ज कर पुलिस ने जांच के नाम पर मामले को भुला दिया। वही, दोनों गार्ड और अधीक्षक पर अब भी मामला कोर्ट में चल रहा है।

सवाल उठता है बालिका गृह के भीतर रह रही लड़की गर्भवती हो जाती है,मामले में जमकर हंगामा प्रदर्शन होता है। लेकिन सुशासन की सरकार की नींद नही खुली और हो हंगामा के बाद सब समय के साथ मैनेज हो गया। काश ! अगर उस समय इस तरह की घटना के बाद  बिहार सरकार और मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन ने सबक लिया होता और असली गुनहगारों को सबक देते हुए सही मॉनिटरिंग हुई होती तो 29 मासूमो की अस्मत लूटने से बच जाती।

                             मुजफ्फरपुर बाल संरक्षण आयोग की दो सदस्यीय टीम पहुँची जो बालिका गृह का निरीक्षण करने के बाद पत्रकारों के सवालों का जबाब देने में हक्के-बक्के नजर आए, क्योंकि राज्य बाल संरक्षण आयोग की टीम पहले भी निरीक्षण करती रही है, इसके निरीक्षण पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं। उन्होंने कहा कि कारवाई होगी दोषी कोई भी हो बख्शें नही जाएंगे।

बिहार सरकार के कुल 15 अल्पावास                  सूबे में बिहार सरकार के कल्याण विभाग द्वारा लगभग 11 बालिका गृह, 24 बाल गृह और 15 अल्पावास गृह फिलहाल चलाए जा रहे हैं। बिहार सरकार अपने स्तर के अलावा एनजीओ के जरिए इन संस्थानों का संचालन करती है। एक बालिका गृह में कुल 50 बच्चियों को रखने का प्रावधान है। इसका संचालन बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग द्वारा किया जाता है। वहीं, एक बालिका गृह- बाल गृह पर लगभग 30 लाख रुपए का सालाना खर्च आता है जिसमें मकान का किराया और बच्चे- बच्चियों के लिए खाने-पीने की व्यवस्था की जाती है। गृहों के संचालन में एक काउंसलर के साथ-साथ 10 लोगों को रखने का प्रावधान है। इन गृहों के संचालन में 90 फीसदी सरकार और 10 फीसदी संबंधित एनजीओ के द्वारा खर्च करने का प्रावधान है।

बताया जाता है कि समाज कल्याण विभाग समय-समय पर इन संस्थानों का निरीक्षण करता है। जिले स्तर पर चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट का गठन किया है। जिले के बालिका गृह और बाल गृह के निरीक्षण की जिम्मेदारी एडिनशल डायरेक्टर (चाइल्ड प्रोटेक्शन) की होती है। साथ ही दो चाइल्ड प्रोटेक्शन अधिकारी भी होते हैं जो उनकी मदद करते हैं। एक एनजीओ से 11 महीने का कॉन्ट्रैक्ट किया जाता है और फिर रिकॉर्ड को देखते कर कॉन्ट्रैक्ट को आगे बढाया जाता है। अनियमितता की रिपोर्ट मिलने पर एनजीओ का कॉन्ट्रैक्ट कैंसल कर दूसरे को मौका दिया जाता है। किसी एनजीओ के सलेक्शन में 10 लाख का टर्न ओवर के साथ बाल कल्याण और बाल प्रोटेक्शन के क्षेत्र में तीन साल का अनुभव होना जरूरी होता है।