आखिर लालू यादव क्यो बन गए है नरेंद्र मोदी के मिशन 2019 के लिए खतरा ? जानिए पूरा सच

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पटना Live डेस्क। शुक्रवार की अहले सुबह 7 बजे 5 निजी गाड़ियों पर सवार होकर 27 सदस्यीय सीबीआई अधिकारियों का दस्ता पटना के 10 सर्कुलर रोड स्थित लालू राबडी के सरकारी आवास पर पहुचा और अपनी कार्रवाई शुरू की। छापेमारी की खबर आग को तरह आम से लेकर खास तक पहुची तो एक बार को तो सियासी भूचाल मच गया। लालू चारा घोटाले के एक मामले में कोर्ट में हाज़िर होने के लिए रांची में थे। राजधानी समेत दिल्ली तक सियासी पारा बढ़ गया। खैर लालू प्रसाद परिवार पर शुक्रवार को पड़े सीबीआई के छापों में कानूनी पहलू अपनी जगह हो सकता है लेकिन इन छापों ने 2019 के चुनाव के दौरान सियासत का मन मिज़ाज़ कैसा होगा इसका संकेत और आभास दे गया है।

2014 मई में मोदी लहर पर सवार भाजपा प्रचंड जीत के रथ पर सवार होकर केंद्रीय सत्ता को कब्जा कर खुद को अजेय समझ रही थी। जीत की खुमारी में बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी जीत को आश्वस्त भाजपा को “लालू ने जहर का प्याला” पीकर नीतीश और कॉंग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर चारो खाने चित कर दिया। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान दूध की जली भाजपा 2019 में छाछ भी फूक फूक कर पीना चाहती है। ताकि किसी भी तरह से कोई गलती न हो जाये और वाजपेयी की तरह दूसरे टर्म खातिर शाइनिंग इंडिया वाला हश्र न हो जाये।
मुल्क की सियासत में वर्त्तमान समय में ममता बनर्जी के सिवा सिर्फ लालू ही एक ऐसा चेहरा हैं जो न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध का सशक्त प्रतीक हैं बल्कि संगठन और वोटबैंक पर लालू की बेहद मजबूत पकड़ है।  साथ ही लगभग सभी पार्टियों के नेताओं के साथ लालू के मजबूत और गहरे सियासी रिश्ते हैं। लालू सियासत का एक ऐसा चेहरा हैं जो दागी तो हैं लेकिन ये दाग मोदी के विरोधियों को अच्छे लगते हैं। लालू मोदी के खिलाफ विपक्ष को लांमबद करने की क्षमता रखते हैं। यदि लालू ने 2019  लोकसभा चुनाव के लिए भी कांग्रेस और नीतीश कुमार को अपने साथ जोड़े रखा तो वे भाजपा के लिए कड़ी चुनौती पेश कर सकते हैं।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया के विश्वस्त साथी है लालू

लालू ने सोनिया का उस वक्त खुलकर साथ दिया जब विदेशी मूल की वजह से कोंग्रेस के अंदर भी विरोध के स्वर उठ रहे थे। ऐसे तमाम मुद्दों पर चट्टान की तरह सोनिया गांधी का समर्थन करने की वजह से लालू का
गांधी परिवार से नज़दीकी रिश्ता बन गया है। वही बात अगर सियासी घमासान की करे तो 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद से लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पक्ष में अलख जगाई थी और विपक्ष को भाजपा के खिलाफ लांमबद किया था। उस समय कांग्रेस के पास लोकसभा में भाजपा के मुकाबले महज 6 सीटें ज्यादा थी लेकिन कांग्रेस लालू जैसे सहयोगी की सियासत के दम पर केंद्र में सत्ता आ गई थी। लालू व कांग्रेस का ये साथ 10 साल तक बना रहा। लालू के भ्रष्टाचार के मामले में साजायाफ्ता होने के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस और लालू के रिश्ते बिगाड़ दिए थे लेकिन 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू और कांग्रेस फिर एक साथ आए जिसका दोनों पार्टियों को फायदा हुआ।

लालू को क्यों कमजोर करना चाहती है भाजपा

भाजपा प्रमुख अमिता शाह को भलिभांति पता है कि 2019 के चुनाव में बिहार की 40 लोकसभा सीटों की अहमियत क्या होगी। अमित शाह ये भी जानते हैं कि यदि 2019 में जनता दल यू राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने यदि मिलकर चुनाव लड़ा तो भाजपा बिहार में 2014 का प्रदर्शन नहीं दोहरा पाएगी। लिहाजा भाजपा एक तरफ बिहार के मुख्यमंत्र नीतीश कुमार के प्रति सदभाव दिखा रही है। जबकि दूसरी तरफ लालू के प्रति अक्रामक सियासत की जा रही है।

लालू गठजोड़ की मिला था बिहार में 42 फीसदी वोट

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस राजद और जदयू अलग अलग चुनाव लड़े थे इन तीनों पार्टियों को कुल मिलाकर करीब 42 फिसदी वोट मिला था लेकिन ये तीनों पार्टियां 8 सीटों पर सिमट गई थी जबकि भाजपा ने रामविलास पासवाना की लोक जन शक्ति पार्टि के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और भाजपा व लोजप और उपेंद्र कुशवाह की राष्ट्रीय लोक शमता पार्टी 36 फिसद वोटों के साथ 31 सीटों पर काबिज हो गए। इन चुनावों के परिणाम नीतीश और लालू दोनों के लिए झटका थे क्योंकि 2014 के चुनाव से पहले नीतीश कुमार मोदी के कट्टर विरोधी चेहरे के तौर पर सामने आए थे।

बिहार की 40 एमपी सीटे है दाव पर 

2014 के चुनाव के दौरान अपने सहयोगियों के साथ राज्य की 40  लोकसभा सीटों में से 31 सीटें जीतने वाली भाजपा 2015 में लालू और नीतीश की सियासी जुगल बंदी के सामने विधानसभा में 53 सीटों पर सिमट गई। जबकि भाजपा की सहयोगी लोक जन शक्ति पार्टी को महज 2 सीटें मिली। इन चुनाव के दौरान कांग्रेस राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यू का वोट एक जुट हो गया और इस गठबंधन ने राज्य की 178 विधान सभा सीटों पर कब्जा कर लिया। भाजपा सम्मानजनक रूप से विपक्ष की भूमिका में भी नहीं आ पाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अघध्यक्ष अमित शाह दोनों 2019 में 2015 की नतीजों को दोहराव नहीं देखना चाहते लिहाजा लालू को सियासी रूप से खत्म करना भाजपा के लिए रणनीतिक तौर पर जरूरी है।