SUPER EXCLUSIVE – बाढ़-सुखाड़, चमकी बुखार, युवा बेरोजगार और हर दिन हत्या-बलात्कार…तो आखिर कैसे ठीके है नीतीश कुमार ?

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पटना Live डेस्क। बिहार में सुशासन की सरकार है ये नीतीश कुमार का दावा है। सूबे में पिछले कुछ दिनों में एक के बाद एक ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जिनसे लगता है कि  नीतीश कुमार का अब शासन और प्रशासन पर नियंत्रण नहीं रहा। अधिकांश मामलों में जिन विभागों से संबंधित घटनाएं हुई हैं वो मुख्यमंत्री के अधीन आने वाले गृह या जेल विभाग की घटनाएं हैं। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पहले किसी घटना के बाद की कार्रवाई से सीएम प्रशासन की धाक दिखाते थे लेकिन अब वो तत्परता और इच्छाशक्ति इन घटनाओं के बाद उनकी प्रतिक्रिया में नहीं दिखाई दे रहा है।

ये हाल तब है जब सूबे में महज 7 महिने बाद यानी अगले साल विधानसभा चुनाव होना है। इसको लेकर सत्ताधारी दल यानी जेडीयू (जनता दल यूनाइटेड) ने अपने तरीके से कैंपेनिंग एक नारे के ज़रिए शुरू कर दिया है। वही विपक्षी दल राजद (राष्ट्रीय जनता दल) ने
जारी नारे को लेकर पोस्टर के जरिये विरोध का बिगुल फूक दिया है। यानी पोस्टर जंग शुरू हो गई है।

दरअसल, दोनों ही सियासी दल बिहार की आवाम को एक ऐसा आइना दिखाने की कोशिश कर रही हैं जिससे वो जनता का ध्यान अपनी और आकर्षित कर सकें। जनता को लुभाने के इस हथकंडे में वो अपनी ओर से कोई कोर-कसर नहीं रखना चाह रहे है।

सूबे की सियासत में जदयू और राजद के पोस्टर्स पर लिखा संदेश चर्चा का विषय बना हुआ है। नीतीश के पोस्टर पर लिखा है, ‘क्यूँ करें विचार, ठीके तो है नीतीश कुमार‘।

इसके जवाब में आरजेडी ने अपने पोस्टर में लिखा है, “क्यों न करें विचार, बिहार जो है बीमार।”

सवाल यह है कि आख़िर नीतीश कुमार को बिहार में सब ठीके क्यों लगता है,जबकि सच्चाई यह है कि बिहार की जनता आज भी चौतरफ़ा मार झेलने को मजबूर है। फिर चाहे वो राज्य की क़ानून व्यवस्था हो, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ हों, रोज़गार और शिक्षा हो या हर साल बाढ़ से ढह जाने वाला जीवन हो।

सबसे पहले बात करते हैं बिहार की क़ानून-व्यवस्था की, जिसमें लूट, हत्या, डकैती और अपहरण जैसे संगीन अपराधों को अंजाम दिया जाना शामिल है। इन सभी वारदातों पर विराम लगाने का ज़िम्मा पुलिस प्रशासन के सिर होता है। जून 2019 के एक सर्वेक्षण के अनुसार बिहार की 54% जनता का कहना है कि पुलिस ख़ुद भ्रष्टाचार में लिप्त होती है, जबकि 34% जनता का मानना है कि पुलिस ख़ुद क़ानून-व्यवस्था का उल्लंघन करती है और एक पक्षपाती भूमिका निभाती है। बिहार की एक बड़ी संख्या (लगभग 77% जनता) यह मानती है कि राजनीतिक दल पुलिस के कामकाज में हस्तक्षेप करते हैं। इन सब कारणों से यह पता चलता है कि बिहार की जनता को क़ानून-व्यवस्था पर बहुत कम या न के बराबर भरोसा है।

चलिए, अब शिक्षा की बात करते हैं, जिसके आँकड़े कुछ इस तरह हैं। दिसंबर 2018 में बिहार के दैनिक अखबार में छपी ख़बर के अनुसार, 10वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों में बिहार और झारखंड सबसे आगे है। इस ख़बर में यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फ़ॉर एजुकेशन (U-DIS) से मिले वर्ष 2014-15 से लेकर 2016-17 तक के आंकड़ों का ख़ुलासा किया गया था। आँकड़े के अनुसार, 2014-15 में माध्यमिक स्तर पर स्कूल छोड़ने वाले छात्र-छात्राओं का प्रतिशत 25% रहा।

वहीं, 2016-17 के दौरान यह आँकड़ा बढ़कर 39.73% हो गया। ख़बर में छात्राओं के स्कूल छोड़ने के पीछे मुख्य वजह शौचालय का अभाव बताई गई थी। इससे पता चलता है कि बिहार में शिक्षा के स्तर पर कुछ ठीक नहीं है, फिर भी नीतीश बाबू का कहना है कि सब ठीके तो है।

 

सरकारी मिशनरी इस आपदा से अनजान नहीं थी, इसलिए आदेश तो निकाले लेकिन राहत-बचाव की कोई तैयारी नहीं की। आपदा प्रबंधन विभाग ने 3 मई 2019 को बिहार के सभी जिलाधिकारियों को एक पत्र भेजा था। यह पत्र हर साल अप्रैल के अंत या मई की शुरुआत में जारी होता है और जून के आख़िर तक इसमें दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन करना होता है। इनमें कंट्रोल रूम बनाना, नावों का इंतज़ाम, गोताखोरों की बहाली, राहत केंद्र के लिए जगह, राशन, दवा, मोबाइल टीम, तटबंधों की सुरक्षा सुनिश्चित करना वगैरह जैसे काम शामिल होते हैं। सवाल यह है कि अगर दिशा-निर्देशों के तहत काम किया गया होता तो बाढ़ से जो ज़िंदगियाँ तबाह हुईं उन्हें बचाया जा सकता था।

हर साल की तरह इस साल भी बिहार में आई बाढ़ से कई ज़िले बुरी तरह से प्रभावित हुए। यह बेहद दु:खद है कि इस विकट समस्या से निपटने के लिए राज्य के पास अब तक कोई ठोस आपदा प्रबंधन प्रणाली नहीं है, फिर भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लगता है कि बिहार में सब ठीके तो है!

हद तो तब पार हो गई जब बिहार के अस्पताल में पीड़ित बच्चों की संख्या इस क़दर बढ़ गई कि उनके इलाज के लिए बेड की कमी पड़ गई और एक ही बेड पर दो बच्चों को लिटाना पड़ा। श्रीराम कृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल के सुपरिटेंडेंट ने इस बात की पुष्टि की थी कि अस्पताल के हर विभाग में डॉक्टर्स की भी कमी है।

इस कमी को पूरा करने के लिए किसी तरह का कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया, यदि उठाया गया होता तो इतने मासूमों की जान न जाती। अच्छा होता यदि इस बीमारी को रोकने के लिए प्राथमिकी स्वास्थ्य केंद्र के स्तर पर स्वास्थ्य प्रणाली को विकसित किया गया होता।

आइए अब बात कर लेते हैं राज्य में फैली बेरोज़गारी की। हिंदुस्तान की ख़बर में सेंटर फॉर मॉनेटरिंग इंडियन इकोनॉमी के सर्वे का ज़िक्र करते हुए लिखा गया कि बिहार में बेरोज़गारी दर वर्तमान में 8% से भी ज़्यादा है।
ग़ौरतलब है कि विदेश मंत्रालय कम पढ़े-लिखे कामगारों को देश से बाहर जाने पर इमिग्रेशन देता है। इनमें वही लोग शामिल होते हैं, जिनके पास रोज़गार नहीं होता। अपने ही राज्य में रोज़गार न मिल पाने से मजबूर लोग रोज़गार के लिए अपना घर-द्वार छोड़कर विदेश जाने का रुख़ करते हैं। 2018 में बिहार के 42 हज़ार से अधिक कामगारों को इमिग्रेशन दिया गया। इनमें से 8,600 लोग इमिग्रेशन लेकर विदेश गए। गोपालगंज से 8300, पश्चिमी चम्पारण से 3,000, पटना से 3,600, सारण से 1,600, मुजफ़्फरपुर से 1,500, मधुबनी से 1,900 और दरभंगा से 1,500 कामगार लोगों को इमिग्रेशन दिया गया।

गली-मौहल्ले में ‘सब ठीके है’ के मात्र पोस्टर लगा देने से ही सब ठीक नहीं हो जाता सुशासन बाबू! अच्छा होता कि आप इस ‘सब ठीके है’ के भ्रमजाल से बाहर निकल आते और राज्य की असली तस्वीर से रुबरू होते। साथ ही अपने अंतर्मन में झाँककर इस सवाल का जवाब तलाशते कि बिहार की जनता आख़िर आपका विकल्प क्यों न तलाशे?

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