क्या लालू के उत्तराधिकारी का भविष्य बचा पाएंगे नीतीश?

रेल टेंडर घोटाला मामले में सीबीआई की रेड ने लालू के राजनीतिक भविष्य को दांव पर लगा दिया है. ताजा छापेमारी और लालू के बेटे तेजस्वी यादव पर एफआईआर ने लालू प्रसाद की भविष्य योजनाओं पर भी ग्रहण लगा दिया है. वैसे तो लालू प्रसाद की राजनीतिक पारी साल 2013 में ही खत्म हो चुकी है,जब वो चारा घोटाले में दोषी करार दिए गए. इसके बाद वो जनता के बीच तो जा सकते हैं लेकिन वो चुनाव नहीं लड़ सकते. ऐसे में उऩके पास अपनी राजनीतिक विरासत को बचाने का बस एक ही रास्ता था. वो रास्ता था अपने बेटों को राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित करना और उन्हें आगे बढ़ाना. बेटों को राजनीति के गुर सिखाने के लिए लालू की किस्मत ने भी सही समय पर उनका साथ दिया. जिस समय लालू प्रसाद अपनी भविष्य की योजनाओं को लेकर चिंतित थे उसी समय नीतीश कुमार ने बीजेपी से नाता तोड़ा और राजद के साथ गठबंधन बनाया. ये गठबंधन लालू के राजनीतिक भविष्य के लिए किसी वरदान से कम नहीं था. समय के साथ सबकुछ ठीक ठाक चलता रहा. उतार चढ़ाव से भरे इस राजनीतिक दौर में लालू ने अपने दोनों बेटों को राजनीति की शिक्षा देने के लिए कई तरह के कड़वे घूंट भी पिए. उऩ्हें लगा कि नीतीश कुमार जैसे मंजे हुए राजनेता के साथ उनके दोनों बेटे राजनीति का हर ककहरा सीख जाएंगे. हुआ भी यही तेजस्वी ने किसी मंजे हुए राजनेता की तरह सारी परिस्थितियों को संभाला और फैसले लिए. लालू को भरोसा था की तेजस्वी उनकी विरासत को बखूबी संभाल लेंगे. लेकिन तभी समय ने करवट लेना शुरु किया. कभी गरीबों के मसीहा कहे जाने वाले लालू प्रसाद पर हजारों करोड़ की बेनामी संपत्ति बनाने के आरोप लगने लगे, नए-नए खुलासे होने लगे. आयकर विभाग ने लालू परिवार की कई संपत्तियों को सील कर दिया. बड़ी बेटी मीसा भारती जो लालू के परिवार में राजनीतिक तौर पर ज्यादा मुखर थीं उनके उपर भी बेनामी करोड़ों की संपत्ति अर्जित करने के आरोप लगे और ईडी ने कई संपत्तियों को अटैच कर दिया. मतलब लालू प्रसाद एक बार फिर जांच,खुलासे के भंवर जाल में उलझ गए. लालू की विरासत संभालने वाले बेटे-बेटियों के खिलाफ जांच शुरु हो गई. बेटी-दामाद के अलावा तेजस्वी और तेज प्रताप भी इसकी चपेट में आ गए.जिस नीतीश कुमार का दामन पकड़कर लालू ने राजद को जिंदा किया उसी नीतीश कुमार ने लालू परिवार पर लग रहे गंभीर आरोपों के बाद नजरें चुरानी शुरु कर दीं. इस बीच सीबीआई लालू के दरवाजे पर पहुंच गई. तेजस्वी पर एफआईआर दर्ज हो गया. नीतीश कुमार पर अब उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर करने का दबाव बढ़ता जा रहा है. जिस नीतीश कुमार से उनको इस कठिन दौर में राहत की आस थी, उन्होंने अभी तक लालू का कोई बचाव नहीं किया है. लालू और राबड़ी पर तो भ्रष्टाचार के दाग पहले  भी लग चुके हैं लेकिन जिस उत्तराधिकारी ने अभी-अभी अपनी राजनीति शुरु की है उसके उपर भी दाग लग गए हैं. विरासत में लालू के किए कामों का फल उऩके चिराग के दामन पर लगे हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब राजनीति क्या करवट लेगी? क्या नीतीश कुमार दागी मंत्री तेजस्वी यादव को बर्खास्त करेंगे या फिर लालू को अभयदान देकर उनकी राजनीतिक विरासत को पालने का काम करेंगे!