बाढ़ की त्रासदी झेल रहे बिहार में राजद की 27 अगस्त की रैली कितनी प्रासंगिक? रैली में भाग लेने को लेकर कांग्रेस ने नहीं खोले हैं पत्ते

पटना Live डेस्क. राजद ने 27 अगस्ती की भाजपा भगाओ रैली  को सफल बनाने के लिए पूरा दम लगा दिया है. तेजस्वी यादव जनादेश अपमान यात्रा पर निकले हैं जिसका मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों को रैली में जुटाना है. खुद लालू प्रसाद ने रैली को सफल बनाने के लिए मोर्चा संभाल लिया है. राज्य के कई हिस्सों में जाकर लालू प्रसाद खुद नीतीश कुमार के खिलाफ बयान देकर अपने समर्थकों को गांधी मैदान पहुंचने का निमंत्रण दे रहे हैं. जाहिर है लालू प्रसाद भी यह जान रहे हैं कि बाढ़ की विभीषिका झेल रहे बिहार में इस समय रैली कराना सही नहीं है. राज्य के 18 जिले भयंकर बाढ़ की चपेट में हैं. लोग अपना घर-बार छोड़ जान बचाने के लिए दूसरी जगह पर शरण लिए हुए हैं. इसलिए इस बात की संभावना कम है कि बाढ़ प्रभावित इलाकों से लोग इस रैली में आ पाएंगे. सो लालू प्रसाद और उनके दोनों बेटे रैली को सफल बनाने के लिए पूरी ताकत लगाए हुए हैं. लालू बखूबी जानते हैं कि अगर रैली असफल हुई तो वो सीधे तौर पर सत्ताधारी पार्टी के निशाने पर आ जाएंगे. जेडीयू और बीजेपी उनकी रैली को लेकर हमलावर है. एक और राज्य भयंकर प्राकृतिक आपदा झेल रहा है ऐसे में लालू की यह रैली कितनी प्रासंगिक है इसका अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है.

वहीं दूसरी तरफ लालू की रैली में कितनी पार्टियां शामिल होंगी यह अभी तक साफ नहीं हो पाया है. तृणमूल की तरफ से ममता बनर्जी और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और उनके रिश्तेदार अखिलेश यादव उनकी रैली में शामिल होने आ रहे हैं लेकिन विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस इस सम्मेलन में हिस्सा लेगी या नहीं यह अभी तक साफ नहीं है. कांग्रेस सूत्रों की मानें तो यह कहा जा रहा है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी लालू की रैली में शामिल होने पटना आएंगे लेकिन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चौधरी की मानें तो अभी यह साफ नहीं है कि पार्टी के कौन-कौन से नेता इस रैली में हिस्सा लेने पहुंचेंगे. उन्होंने कहा कि अगले एक-दो दिनों में स्थिति साफ होने की संभावना है. बिहार कांग्रेस में इस रैली को लेकर नेताओं के अलग-अलग विचार हैं. लालू समर्थक नेताओं का मानना है कि नीतीश कुमार द्वारा पाला बदलने के बाद पार्टी के पास ‘लालू शरणम गच्छामि’ के अलावा क्या विकल्प है? इस गुट के नेता तर्क देते हैं कि लालू सबसे भरोसेमंद सहयोगी साबित हुए हैं और उनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उधर कांग्रेस के लालू विरोधी गुट के नेताओं का तर्क है कि अगस्त 2015 में जब सोनिया गांधी ने नीतीश और लालू के साथ मंच साझा किया था तब वह महागठबंधन की रैली थी और उसमें सभी दलों ने अपनी क्षमता से समर्थक जुटाए थे.

पार्टी नेता मानते हैं कि बिना बाढ़ प्रभावित इलाकों का दौरा किए हुए रैली में जाना विरोधियों को बैठे बिठाए आलोचना का एक मुद्दा दे सकता है. मंच पर लालू यादव का राहुल गांधी के साथ गले मिलना पार्टी को महंगा पड़ सकता है.

हालांकि पार्टी के एक धड़े का मानना है कि अगर पार्टी ने उनकी रैली से किनारा किया तो विपक्षी एकता के राष्ट्रीय स्तर के प्रयासों को झटका लगेगा जो आखिरकार कांग्रेस के हित में नहीं है. वहीं जब नीतीश के साथ सोनिया गांधी ने मंच साझा किया था तो लालू और अन्य गैर बीजेपी नेताओं के साथ क्यों नहीं?

उधर बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस रैली में आने से इनकार कर दिया है लेकिन सूत्रों के मुताबिक उनकी पार्टी के सतीश मिश्र इस रैली में शामिल होंगे. हालांकि इस बात की औपचारिक घोषणा अभी बसपा की तरफ से नहीं की गयी है.