मध्यावधि चुनाव की तरफ जा रहा है बिहार!

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तूफान से पहले शांति. ये बातें हमने और आपने कई लोगों के मुंह से सुनी है और उसको सच होते हुए भी देखा है. जिसके उपर राजनीतिक कहर टूटा है वो तो गरम हैं, लेकिन जिनके उपर इस कहर से बचाने की जिम्मेदारी है वो बिल्कुल शांत हैं. लग रहा है मानो कुछ हुआ ही नहीं. उम्मीद जतायी जा रही है कि वो मंगलवार को बोलेंगे जब पार्टी के बड़े सिपहसलार मौजूद रहेंगे. इसलिए तूफान से पहले शांति की बात सच प्रतीत होती दिखाई दे रही है. नीतीश कुमार उसूलों वाले नेता हैं उम्मीद कम ही है कि वो अपनी शख्सियत को किसी साझीदार के चलते दांव पर लगाएंगे. इसलिए वो चुप हैं और जान रहें हैं कि फैसला अगर लेना है तो एक बार ही क्यों न ले लिया जाए. बार-बार मुंह खोलने की बजाए एक बार में ही राजनीतिक सीन को साफ कर दिया जाए. कई तर्क तूफान से पहले शांति की बात को पुष्ट करते हैं. जानकारी के मुताबिक नीतीश कुमार उप राष्ट्रपित पद के लिए प्रत्याशी चयन को लेकर विपक्षी पार्टियों की आयोजित बैठक में शामिल होने भी नहीं जा रहे हैं. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि कहीं वो अलग राह पर तो नहीं चल रहे.
तेजस्वी न दें इस्तीफा
सीबीआई की रेड और नामजद किए जाने के बाद आरजेडी विधानमंडल की बेहद महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है. अधिक उम्मीद है कि विधायक दल की तरफ से ये प्रस्ताव पारित हो जाए कि तेजस्वी यादव इस्तीफा न दें. और उससे बेहतर महागठबंधन की काफी दिनों से सुलगती आग को ठंडी कर दी जाए. तेजस्वी के बचाव के लिए केंद्रीय मंत्री उमा भारती की नजीर दी जा सकती है. उमा भारती के खिलाफ ट्रायल भी चल रहा है और ऐसे में भी वो केंद्र में मंत्री बनी हुई हैं. मामला साफ है कि अगर केंद्रीय मंत्री चार्जशीटेड होने के बाद भी मंत्री बनी हुई हैं तो महज नामजद किए जाने पर तेजस्वी इस्तीफा क्यों दें?
क्या मध्यावधि चुनाव है विकल्प?
ऐसे में उपाय क्या बचता है? क्या नीतीश अपनी छवि पर दाग लगने देंगे? जानकारों की मानें तो ये संभव नहीं लगता. रणनीतिकार मानते हैं कि नीतीश कुमार दुविधा में हैं. उनके सामने इस भंवर से निकलने का सबसे आसान रास्ता यही है कि वो खुद इस्तीफा देकर राज्य में फिर से चुनाव के लिए जाएं. इस तर्क पर इस लिहाज से दम नजर आ रहा है कि इस्तीफा देने के बाद नीतीश राज्य स्तर पर तो भ्रष्टाचार के खिलाफ सर्वमान्ये नेता के तौर पर उभरेंगे ही साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि और निखरेगी.
बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे नीतीश
जेडीयू के लोग नीतीश के बीजेपी के साथ जाने की संभावना को सिरे से खारिज कर रहे हैं. समर्थक बताते हैं कि ये संभावना दो महीने पहले तक थी लेकिन वर्तमान स्थिति में बीजेपी भी जेडीयू के साथ चलने को तैयार नहीं है. हां,अगर चुनाव हुए तो नए पार्टनर के तौर पर बीजेपी से गठबंधन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. कारण है कि बीजेपी भी राज्य में इस स्थिति में नहीं है कि वो खुद, लोजपा और अन्य साथियों के साथ चुनाव जीत सके. मध्यावधि चुनाव की हालत में जेडीयू को भी एक मजबूत पार्टनर चाहिए कारण है कि चुनाव की स्थिति में सहानुभूति वोट राजद की तरफ जाने की ज्यादा संभावना है.
क्या चुप बैठेंगे लालू?
अब सवाल ये है कि अगर नीतीश इस्तीफा देते हैं और राज्य में नए चुनाव की ओर इशारा करते हैं तो क्या लालू प्रसाद चुप बैठेंगे? लालू को समझने वाले इसका जवाब ना में देते हैं. उनका मानना है कि लालू चुपचाप नहीं बैठेंगे और चुनाव में जाने से बेहतर वो किसी भी तरह सत्ता हासिल करने की कोशिश करेंगे. तर्क यह भी है कि मौजूदा विधानसभा में राजद सबसे बड़ा दल है और वो राज्यपाल के पास नई सरकार बनाने का दावा करेंगे. उस समय उनके पास कांग्रेस के 27 विधायकों का भी समर्थन रहेगा. साधारण बहुमत के लिए सरकार को 122 विधायकों का समर्थन चाहिए. ऐसे में जुगाड़ू लालू बहुमत साबित करने के समय कामचलाऊ बहुमत का जुगाड़ कर सकते हैं.
सीएम कौन
अब सवाल है कि कौन बनेगा सीएम? लालू को बहुमत चाहिए ऐसे में ये संभावना भी मजबूत है कि जेडीयू के भीतर से किसी विशेष जाति के लोग को इस पद के लिए आगे किया जाए. लालू कुनबे का कोई सदस्य फिलहाल राज्य के सीएम पद का दावेदार नजर नहीं आ रहा ऐसे में पार्टी ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति अपना सकती है. सीएम नीतीश कुमार राजगीर से लौट गए हैं. चुप हैं. उनकी चुप्पी मंगलवार को पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में टूटेगी. वह सोमवार को भी बोल सकते थे. साप्ताहिक कार्यक्रम संवाद के बाद वे मीडिया के साथ अपनी बात साझा करते रहे हैं. लेकिन, तबीयत खराब होने के नाम पर संवाद कार्यक्रम रद्द कर दिया गया. मंगलवार को पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में ही वे अपनी राय देंगे. उनकी चुप्पी को तूफान से पहले वाली शांति के तौर पर देखा जा रहा है. अगर उनके मन के मुताबिक डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने कैबिनेट से इस्तीफा नहीं दिया तो सीएम मन की बात करेंगे.