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मीडिया पर हमला जंगलराज की याद क्यों ताजा कर गया?

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वर्तमान समय में बिहार की राजनीति में आपको राजनीत के सब आयाम देखने को मिलेंगे. जहां आग्रह भी है,आदेश भी है, राजनीतिक सुचिता पालन करने का पाठ भी है और दबंगई भी. अब जरा इन चारों आयामों पर गौर कीजीए. सीबीआई रेड और एफआईआर में नाम आने के बाद लालू परिवार गहरे संकट में है. तलवार की धार सीधे तौर पर डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव पर लटक रही है. सीबीआई एफआईआर में नाम आने के बाद कुछ लोग उनसे इस्तीफा देने की मांग कर रहे हैं और राजनीति का धर्म सिखा रहे हैं. उधर राजद के मंत्री पर जेडीयू की टेढ़ी नजर है. सीएम नीतीश कुमार का अपना एक उसूल है और संकेतों के अनुसार वो इससे पीछे हटते दिखाई नहीं दे रहे हैं. सो जेडीयू, राजद को तेजस्वी के मामले पर कोई स्पष्ट राय बनाने की बात कर रही है. जेडीयू के स्वर तल्ख हैं और वो इसको लेकर तरह-तरह के उदाहरण भी राजद के सामने रख रही है. वहीं जेडीयू तल्ख होने के साथ-साथ तेजस्वी को राजनीतिक सुचिता का पाठ भी पढ़ा रही है. इसे लेकर शरद यादव,शहाबुद्दीन तक के उदाहरण दिए जा रहे हैं. इन सबके बीच नेताओं की दबंगई भी सामने आ रही है. मीडिया निशाने पर है. आखिर सवाल भी तो मीडीया को ही पूछना है. जो संकट के केंद्र बिंदु में हैं, जाहिर है वो नाखुश भी हैं और नाराज भी. लेकिन भला मीडिया को उसकी नाराजगी से क्या लेना-देना. उसका काम है सवाल करना और उसका जवाब लेना. बर्खास्तगी को लेकर उहापोह में चल रहे तेजस्वी यादव कैबिनेट की बैठक में शामिल होने सचिवालय पहुंचते हैं. बैठक खत्म होने के बाद जैसे ही वो बाहर निकलते हैं मीडियाकर्मी ने उन्हें घेर लेते हैं. लेकिन उसके बाद जो हुआ वो नब्बे के दशक के लालू राज की याद ताजा करा गया. सवाल पूछने के नाम पर तेजस्वी के बॉडीगार्ड्स ने मीडिया वालों के साथ जो बदसलूकी कि वो निश्चित ही चौथे स्तंभ पर सीधी चोट थी. तेजस्वी भी वहीं खड़े थे लेकिन उऩ्होंने एकबार भी अपने सुरक्षकर्मियों को नहीं टोका. मीडियाकर्मियों के साथ उनके सुरक्षाकर्मियों की बदसलूकी काफी देर तक चलती रही. देखने से ऐसा लग रहा था कि मानो वो सुरक्षाकर्मी नहीं बल्कि प्राइवेट जगहों पर काम करने वाले बाउंसर हों. आखिरकार किसी तरह मामला शांत हुआ. अब बड़ा सवाल है कि आखिर तेजस्वी को सवाल पूछना इतना नागवार क्यों गुजरा? माना कि वो राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. उन्हें यह भी पता है कि सरकार से गए तो फिर कब सरकार में आने का मौका मिलेगा ये उन्हें भी नहीं पता. ये उनकी खुन्नस हो सकती है. कुछ दिन पहले ही जिस दिन सीबीआई की छापेमारी उनके घर हुई थी और उनसे घंटों पूछताछ हुई थी उस दिन भी तेजस्वी ने मीडिया के खिलाफ अपना आपा खो दिय़ा था. लालू प्रसाद ने उन्हें किसी तरह शांत कराया था. राजनीति के नौसीखिए तेजस्वी को शायद मीडिया की अहमियत का पता नहीं. उनके पिता लालू प्रसाद ने सियासी संघर्ष कर अपनी पहचान बनाई. वो जमीन से जुड़े हुए नेता रहे. लालू प्रसाद ये भी जानते हैं कि उन्हें लालू बनने में मीडिया की क्या भूमिका रही है.

तेजस्वी ने लालू प्रसाद से ही राजनीति सीखी है.लेकिन उन्होंने यह नहीं सीखा कि संवैधानिक पद पर बैठने के बाद उसकी गरिमा को कैसे कायम रखा जाए. जाहिर है उन्हें ये पद किसी संघर्ष के चलते नहीं मिला है. एक पारिवारिक पृष्ठभूमि के चलते वो आसानी से इस पद तक पहुंच गए जिसे पाने में कई लोगों ने अपनी जिंदगी लगा दी.

शायद मीडिया को भी उनके तनाव को समझने की कोशिश करनी चाहिए. एक तरफ सीबीआई की रेड से पूरा परिवार आहत है. दूसरे उनकी बड़ी बहन मीसा भारती से ईडी आठ घंटे तक सवाल पूछ रही है. ऐसे में मीडिया के भी वही चुभते सवाल से भला तेजस्वी परेशान तो होंगे ही.

तेजस्वी को लेकर महागठबंधन पर सवाल उठ रहे हैं. जेडीयू उनके खिलाफ कार्रवाई की बात कर उनकी परेशानियों को और भी बढ़ाने का काम कर रही है. ऐसे में तेजस्वी राजनीति के हाईटेंशन तार पर लटक रहे हैं. जहां उन्हें बचने का फिलहाल कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा. हालांकि आज उन्होंने ये कहकर इस बात की सफाई दी कि उन्होंने इस घटना को नहीं देखा, लेकिन ये बात समझ के परे है. ये असंभव है कि तेजस्वी के सुरक्षाकर्मी पत्रकारों से उलझ रहे हों,उनके साथ बदसलूकी कर रहे हों और वो वहीं खड़े होकर इस बात से अनजान हों. खैर बदसलूकी की ये घटना उऩकी राजनीतिक अपरिपक्वता को ही दर्शाता है. घटना उस अंहकार और दबंगई की याद दिलाता है जो लालू प्रसाद के शासन के दौर में उनके परिवारवाले किया करते थे.

अब वक्त बदल गया है तेजस्वी को भी ये सोचना पड़ेगा कि राजनीति ऐसे नहीं की जाती है. राजनीति में सबों को साथ लेकर चलना होता है. अपने शांत स्वभाव से उलट तेजस्वी इस घटना के बाद अनजाने में ही चर्चा का विषय बन गए हैं. उनके आलोचक भी आश्चर्य में हैं कि आखिर उनकी शांत छवि को क्या हो गया? तेजस्वी को ये समझना पड़ेगा कि राजनीति में उठापटक तो चलती ही रहती है, लेकिन इसमें धैर्य दिखाना पड़ता है तभी जाकर आप एक परिपक्व राजनेता के तौर पर उभर कर सब के सामने आते हैं.

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