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Super Exclusive – बिहार चुनाव 2020 के नतीजे के बाद भाजपा नेता कामेश्वर चौपाल के बाबत आपको जानना चाहिए

रोटी के साथ राम का नारा देने वाले चौपाल ने ही 9 नवंबर 1989 को राम मंदिर निर्माण के लिए हुए शिलान्यास कार्यक्रम में पहली ईंट रखी थी। तब से अब तक पूरे देश में चर्चा कें केंद्र में रहे है। लेकिन बेहद लो-प्रोफ़ाइल नेपथ्य से बेहद कारगर और सटीक रणनीति कार और जीत के सूत्र है।

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पटना Live डेस्क।सूबे में विधानसभा चुनाव 2020 के संपन्न होने के बाद अब NDA के बैनर तले नई सरकार के गठन की कवायद जारी है। नतीजों के बाद अब मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री की पद के लिए लगातार उम्मीदवारों की दावेदारी पेश की जा रही थी। लेकिन PM मोदी द्वारा नीतीश कुमार के CM बनने की सहमति और घोषणा के बाद अब उप-मुख्यमंत्री पद के लिए भी भाजपा के अलग-अलग नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं।

                         इसी बीच बिहार के और से 66 वर्षीय दलित भाजपा नेता कामेश्वर चौपाल का नाम भी बहुत तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। हालांकि बिहार के की अवाम के साथ साथ सुुबे के तमात सियासी कारकुनो ख़ातिर  कामेश्वर चौपाल यह नाम थोड़ा चौकाने वाला है।लेकिन कामेश्वर चौपाल भाजपा के पुराने व बेहद दमखम वाले दलित नेता हैं। उनका नाम राम मंदिर आंदोलन से भी जुड़ा हुआ है। इससे बीजेपी का कोर हिंदुत्व वोट बैंक तो मजबूत होगा ही, साथ ही इससे दलित समुदाय के बीच भी बीजेपी की पैठ बढ़ सकती है। ऐसे में कहा जा सकता है कि बीजेपी राम विलास पासवान की मौत से एक बड़े दलित नेता की खाली हुई जगह को भरने की कोशिश में है। मौजूदा समय में बिहार में मजबूत दलित चेहरे की कमी है और कामेश्वर चौपाल को आगे बढ़ाकर भारतीय जनता पार्टी दलितों के बीच सकारात्मक संदेश देने की कोशिश कर सकती है।

भाजपा नेता कामेश्वर चौपाल के समर्थकों ने उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाने की मांग के समर्थन में एयरपोर्ट पर नारे लगाए। वहीं चौपाल ने कहा कि पार्टी उन्हें जो भी जिम्मेवारी देगी वे उसका निर्वाहन करेंगे।उल्लेखनीय है कि कामेश्वर चौपाल अभी किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। लेकिन अयोध्या राम मंदिर जन्मभूमि न्यास समिति के एक सदस्य जरूर हैं।

राम मंदिर ट्रस्ट में बिहार से एकमात्र सदस्य

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय के बाद मोदी सरकार द्वारा राम मंदिर निर्माण के लिए 15 सदस्यीय ट्रस्ट का गठन कर दिया है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र नामक इस ट्रस्ट के प्रमुख वरिष्ठ वकील के. परासरन बनाए गए हैं। परासरन सालों तक लंबे चले इस विवाद में हिंदू पक्ष के वकील थे। उनके दलील और सटीक तर्कों के सहारे ही सुप्रीम कोर्ट से इस विवाद पर हिंदूओं की जीत हुई।

इस ट्रस्ट में बिहार से एक मात्र व्यक्ति कामेश्वर चौपाल को शामिल किया गया है। यूं तो कामेश्वर चौपाल संघ में बड़े नाम हैं। लेकिन ज्यादातर लोग इनके बारे में बहुत कुछ नहीं जानते हैं। यहां हम आपको कामेश्वर चौपाल के बारे में जरूरी जानकारियां दे रहे है।

सुपौल में जन्म, मधुबनी में की पढ़ाई

24 अप्रैल 1956 में जन्मे कामेश्वर चौपाल बिहार के सुपौल जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने अपनी कॉलेज तक कि पढ़ाई-लिखाई मधुबनी से की। जेएन कॉलेज मधुबनी से स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद मिथिला विवि दरभंगा से 1985 में एमए की डिग्री ली। उसी दौरान वे संघ के संपर्क में आए। उनके शिक्षक और संघ कार्यकर्ता की मदद से उन्हें उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज में एडमिशन मिला। ग्रेजुएशन करने के बाद कामेश्वर ने अपना जीवन पूरी तरह से संघ को समर्पित कर दिया। उन्हें मधुबनी जिले का जिला प्रचारक बनाया गया। तभी तमिलनाडू में 800 दलितों मुस्लिम अपनाने की घटना हुई। जिसके बाद वो दलितों के बीच संघ की पैठ को मजबूत करने में जुट गए।

राम मंदिर शिलान्यास की पहली ईंट रखी

1980 के दशक में जब राम मंदिर के लिए आंदोलन की सुगबुगाहक तेज हुई तो भाजपा, विहिप सहित अन्य संस्थाओं ने रणनीति बनानी शुरू की। इसी बीच राम मंदिर के लिए पहली यात्रा बिहार के सीतामढ़ी जिले में निकाली गई। इस यात्रा को जबरदस्त जनसमर्थन मिला। 1986 में राजीव गांधी द्वारा विवादित ढांचे के ताले खुलवा दिए गए। जिसके बाद 1989 में संघ ने शिलान्यास का कार्यक्रम रखा। राम मंदिर निर्माण के शिलान्यास के लिए कामेश्वर चौपाल को भी चुना गया। कामेश्वर तब अयोध्या में ही रहते थे। उन्होंने ही राम मंदिर निर्माण के लिए सबसे पहली ईंट रखी। इस कारण राम मंदिर निर्माण के लिए पहली ईंट रखने वाले कारसेवक के रूप में कामेश्वर का जाना जाने लगा।

राम मंदिर शिलान्यास से रिश्ता क्या?

आपको बता दें कि फरवरी 2020 में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए गठित ट्रस्ट में बिहार से भाजपा नेता कामेश्वर चौपाल को भी शामिल किया गया था। कामेश्वर चौपाल ने ही 9 नवंबर 1989 को राम मंदिर निर्माण के लिए हुए शिलान्यास कार्यक्रम में पहली ईंट रखी थी। राम मंदिर की नींव रखी थी। इसके साथ ही उन्होंने राम नहीं तो रोटी नहीं का नारा देकर राम भक्तों में जोश भर दिया था। उस समय वह पूरे देश में चर्चा के केंद्र में थे।

विहिप में बिहार के सह संगठन मंत्री होने के नाते कामेश्वर चौपाल भी आयोध्या में मौजूद थे। तब पूर्व में लिए गए निर्णय के अनुसार धर्मगुरुओं ने कामेश्वर चौपाल को शिलान्यास के लिए पहली ईंट रखने को कहा। चौपाल इसके पहले तक अनजान थे। तब चौपाल ने बताया था कि हालांकि उन्हें यह पता था कि धर्मगुरुओं ने किसी दलित से ईंट रखवाने का निर्णय लिया है, लेकिन वे खुद होंगे, यह उनके लिए संयोग रहा। शिलान्यास के बाद से ही कामेश्वर चौपाल चौपाल का नाम पूरे देश में छा गया।बाद में लालकृष्ण आडवानी के नेतृत्व में राम मंदिर के रथ यात्रा निकाली गई। जिसमें कामेश्वर चौपाल ने महती भूमिका निभाई।

रामविलास पासवान के खिलफ लड़े चुनाव

शिलान्यास प्रकरण के बाद वे विधिवत भाजपा में शामिल होकर राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हो गए। कामेश्वर चौपाल की लोकप्रियता को देखते हुए भाजपा ने साल 1991 में रोसड़ा सुरक्षित लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाया। हालांकि वे चुनाव हार गए थे। इसके बाद 1995 में चौपाल बेगूसराय की बखरी विधानसभा सीट से भी चुनाव लड़े पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा। साल 2002 में वे बिहार विधान परिषद के सदस्य बने। 2014 तक वे विधान परिषद के सदस्य रहे।

वर्ष 2014 में भी सुपौल लोकसभा से लड़े थे चुनाव
इसी बीच 2014 में पार्टी ने इन्हें सुपौल लोकसभा का उम्मीदवार बनाया। हालांकि वे अपने गृह जिले सुपौल में भी चुनाव हार गए लेकिन भाजपा उम्मीदवार के रूप में उन्होंने दो लाख 49 हजार वोट प्राप्त किया और तीसरा स्थान प्राप्त किया।

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