बेधड़क ...बेलाग....बेबाक

Fact Finding-सिवान के साहेब के अंत की पटकथा लिखने वाला आईपीएस छोड़ कर जा रहा है बिहार,उसके जिगरबाजी की कहानियाँ 

शहाबुद्दीन को लेडी सब इंस्पेक्टर के हाथों पहनवाई थी हथकड़ी, लालू यादव के बड़े सरकार को लिया था विधानसभा से दबोच

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पटना Live डेस्क। एक अफसर अगर चाह ले तो क्या-क्या नहीं कर सकता? कानून का डंडा हर टेढ़े को टेकुए की तरह सीधा कर सकता है।बस जरूरत है कानून को अक्षरशः लागू करने की हिम्मत व ज़ज़्बे की। ऐसा ही कुछ चमत्कार करते हुए केपी एस गिल ने पंजाब में आतंकवाद का खात्मा कर बता दिया था कि एक अकेला आदमी भी सिस्टम को दुरुस्त कर सकता है।बिहार में भी एक ‘सरदार जी’ की हनक और कानून को नाज़िल करने की काबिलियत का डंका बजा व खूब बजा पुरजोर बजा, अपराधियों के कहर से कराह रहे बिहार को ‘सरदार जी’ ने अकेले दम पर बदलने की मुहिम चलाई जो बेहद कामयाब रही और उसका दूरगामी असर पड़ा। नज़र डालते है इस जिगरबाज़ के बतौर आईपीएस किए जाबाजी के कारनामो पर।

अपराधियों का बिठाया भट्ठा नाम है भट्टी 

बिहार कैडर में 1990 बैच के एक दुबले पतले आइपीएस अफसर राजविंदर सिंह भट्टी ने योगदान किया। दिखने में मासूम पर मजबूत इरादों वाला इस शख़्स ने योगदान देते ही अपने इरादे स्पष्ट कर दिए। अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने की शुरुआत करते हुए बड़े सरकार को ही सबसे पहले धर दबोचा।

राजद विधायक को किया गिरफ्तार

1990 के दौर में जब लालू यादव की तूती बोलती थी। तब भट्टी ने राजद विधायक दिलीप सिंह को गिरफ्तार कर लिया था। उस समय विधानसभा का सत्र चल रहा था। जब सदन का सत्र चल रहा हो तो विधायक को गिरफ्तार करने के लिए स्पीकर की मंजूरी लेनी होती है। भट्टी उस समय बाढ़ के एएसपी थे। उन्होंने पटना के एसएसपी और डीएम को इसकी भनक तक नहीं लगने दी और ऐन सबेरे विधायक दिलीप सिंह (मोकामा के मौजूदा विधायक अनंत सिंह के बड़े भाई) को गिरफ्तार कर लिया था। भट्टी ने बिहार के दबंग नेता रहे प्रभुनाथ सिंह को भी कानून के शिकंजे में कसा था।फलाफल यह हुआ कि भट्टी की छवि एक बेहद कड़क व सियासी मफ़ादात से बेपरवाह अफसर की है। एक वक्त था जब बिहार के अपराधी और सफेदपोश उनके नाम से कांपते थे।

साहब के सीवान में भट्टी की इंट्री

वाक्या नवम्बर 2005 का है। उस समय बिहार विधानसभा चुनाव का अंतिम समय था। राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था। अफसरों के लिए काम करना थोड़ा आसान हो गया था। सितम्बर 2005 में राजविंदर सिंह भट्टी सीवान में एसपी बन कर आये थे। बाहुबली शहाबुद्दीन सीवान के सांसद थे। तब सीवान में शहाबुद्दीन की इजाजत के बिना पत्ता नहीं डोलता था। इस बात का आरोप लगता रहा है कि शहाबुद्दीन को लालू प्रसाद यादव का संररक्षण प्राप्त है। लालू यादव उस समय रेल मंत्री थे।

शहाबुद्दीन के अंत की लिखी पटकथा

2001 में शहाबुद्दीन को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस ने एक बड़ा ऑपरेशन लॉन्च किया था। इस कार्रवाई में 10 लोग मारे गये गये थे। एक पुलिस जवान भी शहीद हुआ था। लेकिन शहाबुद्दीन को पुलिस पकड़ नहीं पायी। अप्रैल 2005 में सीवान के तत्कालीन डीएम सीके अनिल और एसपी रत्न संजय ने एक बार फिर बड़ी कार्रवाई की थी। फिर भी शहाबुद्दीन पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहा। शहाबुद्दीन पर कई आपराधिक मामले दर्ज थे। उसकी गिरफ्तारी का वारंट निकला हुआ था। इसी समय राजविंदर सिंह भट्टी की सीवान में इंट्री होती है।

गिरफ्तारी का सॉलिड प्लान

राजविंदर सिंह भट्टी इस बार मौका नहीं चूकना चाहते थे। शहाबुद्दीन की गिरफ्तारी के लिए एक फुलप्रूफ योजना बनायी। कहा जाता है कि शहाबुद्दीन का गुरूर तोड़ने के लिए भट्टी ने एक महिला सब इंस्पेक्टर गौरी कुमारी को इस ऑपरेशन की कमान सौंपी थी। जब गौरी कुमारी ने शहाबुद्दीन को हथकड़ी पहनायी तो बिहार पुलिस के लिए वह एक अभूतपूर्व नजारा था। हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना था भट्टी ने इस ऑपरेशन को गुप्त रखने के लिए गौरी कुमारी का चयन किया था। हुआ कुछ यूं। शहाबुद्दीन उस समय संसद के सत्र में भाग लेने के लिए दिल्ली में थे। भट्टी ने गौरी कुमारी के नेतृत्व एक स्पेशल टीम बनायी। ये टीम दिल्ली पहुंची। बिहार पुलिस की टीम ने दिल्ली पुलिस से सम्पर्क किया। आर एस भट्टी सीवान में ही बैठ कर ऑपरेशन को ऑपरेट कर रहे थे। किसी को कानों खबर नहीं हुई।

दिल्ली में दबोचे गए साहब

पांच नम्बर 2005 की रात। पुलिस ने शहाबुद्दीन के दिल्ली आवास को चार तरफ से घेर लिया। दारोगा गौरी कुमारी ने शहाबुद्दीन को अगाह किया कि वे कानून के साथ सहयोग करें वर्ना एक्शन के लिए तैयार रहें।उन्हें गिरफ्तारी का वारंट दिखाया गया। रात का वक्त था। शहाबुद्दीव लुंगी पहने घर में बैठे थे। गौरी कुमारी ने शहाबुद्दीन को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें दिल्ली के नजदीकी में थाना लाया गया। अगले दिन कोर्ट में पेश कर ट्रांजिट रिमांड ली गयी। गौरी कुमारी शहाबुद्दीन को लेकर 6 नवम्बर की रात पटना पहुंची। शहाबुद्दीन की गिरफ्तारी किसी धमाके से कम न थी। कानून व्यवस्था की समस्या हो सकती थी। तब आरएस भट्टी की सलाह पर शहाबुद्दीन को हेलीकॉफ्टर से सीवान लाने का फैसला किया गया। शहाबुद्दीन को लेकर हेलीकॉप्टर से लेकर गौरी सीवान पहुंची। 7 सितम्बर को शहाबुद्दीन की सीवान कोर्ट में पेशी हुई जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। 8 नवम्बर को उन्हें भागलपुर जेल में शिफ्ट किया गया।

भट्टी का तबादला

आरएस भट्टी किसी राजनीतिक दबाव को मानने वाले अफसर नहीं थे। उनकी इस कार्रवाई से राजद में खलबली मच गयी। बिहार में तब राष्ट्रपति शासन लागू था। परोक्ष रूप से बिहार का शासन केन्द्र सरकार चला रही थी। केन्द्र सरकार लालू यादव के सहयोग से चल रही थी। इस साहसिक अभियान के बाद आर एस भट्टी का तुरंत तबादला कर दिया गया था। लेकिन भट्टी ने ढाई महीने में ही वो कर दिया जो दस साल में नहीं हो पाया था।

                        इस घटना के 16 दिन बाद ही बिहार में नीतीश कुमार की सरकार का आगमन हुआ। इसके बाद शहाबुद्दीन पर कानून का शिंकजा कसता चला गया। कानून का पाठ पढ़ाने में आर एस भट्टी का कोई जवाब नहीं। वे कानून के आगे बड़े से बड़े नेता की भी परवाह नहीं करते। भट्टी के द्वारा गिरफ्तार कराए गए मो. शहाबुद्दीन तब से अपने मौत के दिन तक जेल में अपने कर्मो की सज़ा भुगतते रहे। भागलपुर जेल से जमानत पर बाहर निकले भी तो पुनः सुप्रीम कोर्ट ने जमानत रद्द करते हुए पुनः जेल भेज दिया था।

विगत वर्षों में बिहार में लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति इतनी खराब हो गयी है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पंद्रह दिनों में तीन बैठकें करनी पड़ी। लेकिन नतीजा सिफर है।सीएम हर बैठक पुलिस अफसरों को मुस्तैदी से काम करने का निर्देश देते हैं। अपराधी पहले से भी बड़ी वारदात कर डालते हैं। गुंडों-बदमाशों में कानून का खौफ जरूरी है। भ्रष्ट, निकम्मे और ढीले अफसरों की वजह से बिहार पुलिस की भद्द पिट रही है। बिहार के लोगो को उम्मीद थी कि भट्टी को सरकार बेपटरी कानून व्यवस्था को सुधारने ख़ातिर महती भूमिका में रखेगी लेकिन अचानक उनको केंद्रीय प्रतिनियुक्ति ख़ातिर बिहार सरकार द्वारा रिलीज करना कई सवाल खड़े करता है?

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