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Fact Finding (Video)जिस राज्य में DM कहता हो कि “जाति से ऊपर कुछ नहीं”वहाँ जातिगत जनगणना से सौहार्द भाईचारा व शान्ति व्यवस्था भंग नही होगा?

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पटना Live डेस्क। बिहार में जाति आधारित (Caste Census in Bihar) जनगणना को नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। इस संबंध में मुख्य सचिव आमिर सुभानी ने जानकारी दी। उन्होंने कहा कि जातिगत जनगणना के दौरान आर्थिक आधार पर सर्वे कराने का भी प्रयास किया जाएगा। इसके लिए 500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इसे 2023 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही आमिर सुभानी ने कहा कि जाति आधारित जनगणना राज्य स्तर पर सामान्य प्रशासन विभाग(General Administration Dept) द्वारा किया जाएगा और जिला स्तर पर डीएम नोडल अधिकारी होंगे।

                   उल्लेखनीय है कि इसका स्वागत भी हो रहा तो कई तबको और सोशल मीडिया के मंचों से जमकर विरोध भी हो रहा है। इसको लेकर तमाम तरह के तर्क दीए जा रहे है।लेकिन सूबे में विगत 3 दशक से सत्ता के सिकंदर दोनो प्रमुख दल राजद और जदयू इसके सपोर्ट में एक साथ एक मंच पर है।जानते है क्योकि बिहार में सत्ता का रास्ता जाति की चौखट से होकर जाता है। अगर कुर्सी चाहिए तो जाति का समीकरण बिठाना आना ही चाहिए।

               तभी तो कहते है बिहार में चुनाव हों और जाति की बात न हो तो चर्चा ही बेमानी हो जाती है। जैसे-जैसे चुनावी माहौल बनना शुरू होता है जातीय गोलबंदी तेज होती जाती है।हो भी क्यों न,सूबे में चुनाव लड़ने वाली दो प्रमुख राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस को छोड़ दें तो सभी पार्टियों की अपनी एक जाति की राजनीति है।सूबे में लालू यादव का राष्ट्रीय जनता दल हो या नीतीश की जनता दल यूनाइटेड या फिर चिराग़ पासवान की पार्टी या फिर मुकेश साहनी या फिर जीतराम मांझी का सियासी दल हो ये सभी पार्टियां जाति की राजनीति पर ही अपनी जगह बनाए हुए हैं। तभी तो हालात ये है कि आज भी बिहार में विकास या कानून व्यवस्था आज भी कोई मुद्दा नही बन पाता है। गर कोशिश भी होती है तो अंततः तामम सियासी दल जीत ख़ातिर जातीय गणित पर निर्भर हो जाते है।

                बिहार का शासन प्रशासन हो या सियासी मंच जात जमात इसपर किस कदर हावी है इसकी बानगी समय समय पर दिखती रहती है। हद तो तब हो जाती है जब सरकारी एदारों में सत्ता शीर्ष पर मौजूद शख्स की जाति के नौकरशाहों की तूती बोलने लगती है। साथ ही उस जाति को सरकारी जाति का तमगा दे दिया जाता है। इसकी बानगी भी बिहार में दिखी जब एक जिले के DM पद को सुशोभित करने वाला शख्स एक जाति विशेष के सम्मेलन में शिरकत करने जा पहुचा।

डीएम ने कहा- जाति से ऊपर कुछ नहीं,अपने लोगों को ही दो वोट फिर चाहे वो दुश्‍मन ही हो

                बिहार में जाति आधारित (Caste Census in Bihar) जनगणना को नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। इसके लिए 500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इसे 2023 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।लेकिन इसी बीच एक IAS का वीडियो खूब वायरल हो रहा है। जिसने कहा था कि जाति से ऊपर कुछ नहीं,अपने लोगों को ही दो वोट फिर चाहे वो दुश्‍मन ही हो।

                    दरअसल, वायरल वीडियों वर्ष 2016 के बिहार में डिस्ट्रिक्‍ट मजिस्‍ट्रेट के पद पर तैनात एक आईएएस अधिकारी का कथित वीडियो क्लिप के चलते विवाद खड़ा हो रहा है।  आरोप है कि वीडियो क्लिप में डीएम कह रहे हैं कि लोगों को चुनावों में अपनी जाति के व्‍यक्तियों को ही वोट करना चाहिए। इससे उनका प्रतिनिधित्‍व बढ़ेगा। बताया जा रहा है कि यह वीडियो शिवहर के डीएम और 2010 के बैच के बिहार कैडर के आईएएस अधिकारी राजकुमार का (तात्कालिक डीएम) है। उन्‍होंने सीतामढ़ी में गणिनाथ मंदिर में कार्यक्रम के दौरान यह बयान दिया। 7 मिनट 49 सैकंड की इस वीडियो क्लिप में वे यह कहते सुनाई दिए कि जाति से ऊपर कुछ नहीं है। साथ ही एक अति पिछड़ी जाति के लोगों से कह रहे हैं कि वे अपनी जाति के उम्‍मीदवारों को ही वोट दिया करें।

            वीडियो क्लिप में राजकुमार कहते सुने गए, ”यदि वह आपका दुश्‍मन है तो इसे भुला दो और चुनाव में केवल उसे ही वोट दो। फिर चाहे वो विधानसभा का चुनाव हो या कोई अन्‍य चुनाव। 243 विधायकों में से आपकी जाति के केवल 3 विधायक हैं। सभी जगहों पर अपना प्रतिनिधित्‍व बढ़ाएं और पंचायत से लेकर विधानसभा तक चुनावों में सक्रियता से भाग लीजिए।” हालांकि वीडियो की सत्‍यता की पुष्टि नहीं हो पाई है। राजकुमार बिहार के सारण जिले के रीवलगंज के रहने वाले हैं। उनके भाषण पर लोगों ने काफी तालियां बजाईं।

             मुल्क में 1931 में आखिरी बार जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी हुए थे। सनद रहे कि उस वक्त अलग अलग राज्य के स्थान पर अलग अलग रियासते थीं। अतः रियासतों के आधार पर आंकड़ें जारी किए गए थे।जैसे बिहार, झारखंड, ओडिशा एक रियासत थी। आज़ादी के बाद भारतीय सियासत में 1931 के जातिगत जनगणना के आधार पर जातिगत राजनीति की शुरुआत हुई। उसके बाद से ही लोग जाति से ख़ुद को जोड़ कर देखने लगे जाति के आधार पर पार्टियाँ और एसोसिएशन की भरमार हो गई।फिर अगर बिहार यूपी की बात करे तो कालांतर में अपराधियों की जातीय समीकरण बनने लगे। यूपी में तो बाकायदा दस्यु गिरोह भी जातीय खाँचे में ढल गए। तो दूसरी तरफ बिहार मे जाति आधारित निजी सेनाए वजूद में आई जिनमे रणवीर सेना सबसे विख्यात कुख्यात के तौर पर जानी गई। जो लागातर बढ़ते हुए अब तो बाकायदा मंच बने हुए है जातिगत।

वही,वर्त्तमान में राजनीति होती है, उसका ठोस आधार नहीं है, बस महज 1931 के डेटा के आधार पर खुद के जरिए आकलन किया जाता है। इस जातीय सख्या को चुनौती दी जा सकती है, लेकिन एक बार जनगणना में वो दर्ज हो जाएगा, तो सब कुछ ठोस रूप ले लेगा। फिर उसके बाद जो सियासी भसड़ होगी उसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

           वैसे भी सियासत में कहा जाता है, ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। अगर संख्या एक बार पता चल जाए और उस हिसाब से हिस्सेदारी दी जाने लगे, तो कम संख्या वालों का क्या होगा?उनके बारे में कौन सोचेगा? इस तरह के कई सवाल भी खड़े होंगे। ओबीसी और दलितों में ही बहुत सारी छोटी जातियाँ हैं, उनका कौन ध्यान रखेगा? बड़ी संख्या वाली जातियाँ आकर माँगेंगी कि 27 प्रतिशत के अंदर हमें 5 फ़ीसदी आरक्षण दे दो,तो बाक़ियों का क्या होगा? ये जातिगत जनगणना का एक नकारात्मक पहलू है।

एक दूसर सबसे बड़ा डर भी है। ओबीसी की लिस्ट केंद्र की अलग है और कुछ राज्यों में अलग लिस्ट है। कुछ जातियाँ ऐसी हैं जिनकी राज्यों में गिनती ओबीसी में होती है,लेकिन केंद्र की लिस्ट में उनकी गिनती ओबीसी में नहीं होती। जैसे बिहार में बनिया ओबीसी हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में वो अपर कास्ट में आते हैं। वैसे ही जाटों का हाल है।हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों पर भी ओबीसी लिस्ट अलग है। ऐसे में जातिगत जनगणना हुई तो आगे और बवाल बढ़ सकता है। केंद्र की सरकारों को एक डर इसका भी है।

                 वही,बिहारी अस्मिता और जाति नही जमात व बिहारियों की सियासत करने का दावा करने वाले नीतीश कुमार ने (Caste Wise Cansus) को लेकर ऑल पार्टी मीटिंग बुलाई गई थी, जिसमें जाति आधारित जनगणना को लेकर फैसला लिया गया है। अब सर्वसम्मित के बाद नीतीश कुमार ने जातिगत जनगणना को मंजूरी दे दी है और बिहार सरकार अपने खर्चे पर जनगणना करवाई जाएगी।500 करोड़ की भारी भरमक राशि इसपर खर्च होगी।

दरअसल, सुशासन के दावे की खुलती पोल बेहिसाब सरकारी दफ्तरों में आम आदमी से उगाही, बढ़ता अपराध व बेलगाम अपराधी सूबे में खूब तांडव मचा रहे है। सरकार सिर्फ शराब शराब की शोर में डूबी है जो लगभग फेल हो चुका है। विकास और कानून का राज़ का बैलून फुट रहा है। सुशासन की साख अंतिम साँसे ले रही है। इस सब से इतर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जातीय जनगणना की घोषणा कर दिए है।लेकिन वक्त का मयार देखिए फैसला ही सुशासन की नाव ख़ातिर आखरी कील साबित होगी क्योंकि ये जो पब्लिक है तो वही तेजस्वी की एमवाई और सशक्त होगी यह तो इस जनगणना में तय है।

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