Super Exclusive – नागमणि की पत्नी सुचित्रा सिन्हा की नीतीश कैबिनेट में वाइल्ड कार्ड इंट्री लगभग तय ! एक तीर से सधेंगे कई निशाने

पटना Live डेस्क। बिहार की सियासत की चूले हिला देने वाले मुजफ्फरपुर शेल्टर हाउस प्रकरण में बीते 15 दिनों से जबरदस्त सियासी विरोध और मीडिया की मुहिम के बाद आखिरकार नीतीश सरकार की एकमात्र महिला कैबिनेट मंत्री मंजू वर्मा ने मंत्रीपद से इस्तीफा दे दिया। विपक्ष अपनी सियासी जीत मान कर खुश होकर अब सीएम नीतीश कुमार के इस्तीफ़े की मांग कर रहा है। लेकिन समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा के इस्तीफ़े के इतर भी अपने अप्रत्याशित निर्णय ख़ातिर मशहूर नीतीश कुमार इस सियासी बवंडर को अपने सियासी भविष्य के कील काँटों और जातीय समीकरण को साधने के तानेबाने को दुरुस्त करने की जुगत में है। यानी एक निर्णय तीर और कई निशाने सध जाएंगे।

दरअसल,इस्तीफा देनेवाली मंजू वर्मा नीतीश कैबिनेट में शामिल इकलौती महिला मंत्री भी थी। नीतीश कैबिनेट में एनडीए के तीन घटक दलों की भागीदारी होने के बावजूद अकेले मंजू वर्मा ही जदयू कोटे से मन्त्रिमण्डल में शामिल एकमात्र महिला मंत्री थी। मंजू के इस्तीफे के बाद नीतीश कैबिनेट में आधी आबादी का प्रतिनिधत्व शून्य हो गया है। मालूम हो कि नीतीश कुमार अपनी सियासी एजेंडे ने आधी आबादी को बेहद प्रमुखता से स्थान देते रहे है। यानी दो बातें स्पष्ट है। समाज कल्याण मंत्रालय में मंजू वर्मा की जगह कोई महिला ही लेगी और ये भी तय है कि जल्द ही आधी आबादी को कैबिनेट में प्रतिनिधित्व मिल जाएगा।

वाइल्ड कार्ड से सुचित्रा सिन्हा ही क्यो ?                                         कहते है सियासी सिकन्दर वही है जो हर राजनीतिक बवंडर और मजबूरी को भी भविष्य को देखते हुए सुअवसर में तब्दील कर ले। इस मामले में नीतीश की कोई सानी नही है। इस बात कयास जोरो पर है की नीतीश कुमार जल्द ही महिला कोटे से किसी नए चेहरे को अपनी कैबिनेट में जगह देंगे। जदयू के अंदर भी कैबिनेट में शामिल होने के लिए महिला दावेदारों की कोई कमी नही है। राजनीतिक गलियारे में कई नामों की चर्चा भी शुरू हो चुकी है। कई नाम मीडिया के  विभिन्न माध्यमो से सियासी फिज़ों में तैरने भी लगे है।
लेकिन नीतीश कुमार के सियासी मिज़ाज़ और निर्णयों को समझना या उसका अंदाजा लगाना आसान नहीं पर बहुत मुश्किल भी नही है। दरअसल नीतीश अमूमन एक फैसले से कई निशाने साधते है। ताकि सियासी भविष्य और वर्त्तमान दोनों बैलेंस रहे और आने वाले सियासी बवंडर को जड़ से उखाड़ फेंका जाय।
दरअसल सूबे की सियासत में जातीय समीकरण बहुत बड़ा फैक्टर है। नीतीश मन्त्रिमण्डल से बहुत बेआबरू होकर रुख़सत हुई मंजू वर्मा मंजू वर्मा के इस्तीफे के बाद भी नीतीश ने उनकी जाति का खासा ख्याल रखा। तभी तो मंजू के इस्तीफे से खाली हुए समाज कल्याण विभाग की जिम्मेवारी मंत्री कृष्णनंदन वर्मा को ही सौंपी है जो मंजू वर्मा के ही बिरादरी यानी कुशवाहा समाज से आते हैं। यानी कोशिश यही की लव कुश को कही से भी आघात न पहुचे। उल्लेखनीय है कि बिहार में यादव के बाद सबसे अधिक (करीब 10 फीसदी) कुशवाहा वोटर हैं और इसको नाराज करने के जोखिम नीतीश कुमार शायद ही ले।                      वही, दूसरी तरफ उपेंद्र कुशवाहा सूबे में कुशवाहा बिरादरी के सर्वमान्‍य नेता बनने की वर्षो से तबड़तोड कोशिश करते रहते हैं,जोकि नीतीश कुमार को कभी मंजूर नहीं होगा। लेकिन वर्त्तमान समय मे उपेंद्र कुशवाहा भी बिहार के जातीय समीकरण को साधने में लगे हैं। उसी के तहत उन्होंने अपने दल रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर नागमणि को कामन सौप रखी है।कुशवाहा का जातीय समीकरण

दरअसल, नागमणि बिहार में कुशवाहा समाज से ही आते हैं जिस समाज से उपेंद्र कुशवाहा आते हैं। साथ ही वो कुशवाहा समाज के एक बड़े नेता प्रभावशाली दिवंगत जगदेव प्रसाद के बेटे हैं। तभी तो नागमणि की पार्टी में इंट्री और फिर सीधे पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष के पद पर बैठाने के पीछे कुशवाहा की सोची-समझी रणनीति है। इसी की तोड़ और 2020 में उपेंद्र कुशवाहा के सपने को तोड़ने खातिर नीतीश कुमार की रणनीति में नागमणि और सुचित्रा सिन्हा बेहद मुफीद है।                तभी तो नीतीश के दूत नागमणि के घर भी पहुंच कर उनका मन टटोल रहे है। उल्लेखनीय है कि बिहार विगत महिनो पूर्व विधान परिषद चुनाव के समय नागमणि की पत्‍नी सुचित्रा सिन्‍हा का नाम जदयू की ओर से बड़ी तेजी से उभर कर सामने आया था। लेकिन तब एक अन्य कुशवाहा बिरादरी के ही नेता ने ही सुचित्रा पर बढ़त बनाते हुए विधान परिषद में एंट्री ले लेने में कामयाबी हासिल कर ली। लेकिन अब वक्त भी सुचित्रा सिन्‍हा को सुअवसर प्रदान करता दिख रहा है। महिला और कुशवाहा दोनों क्राइटेरिया नागमणि की पत्नी के फेवर में है। भले ही नागमणि का पूरे कुशवाहा समाज पर पकड न हो पर 10 फीसदी वाले अपने समाज पर कही कही अच्छी पकड़ तो है ही साथ ही पिता का नाम और उपेंद्र कुशवाहा की महत्वाकांक्षा उनके सियासी बियाबान में लंबे दौर से भटकते रहने का अंत का वाहक बनजाने में महत्वपूर्ण कारक बना सकता है।
लेकिन ध्‍यान रखने की बात यह है कि सुचित्रा सिन्‍हा अभी किसी सदन की सदस्‍य नहीं हैं। तो इसका समाधान भी संविधान में है कोई भी जो किसी भी सदन का सदस्य नही है मंत्री पद ग्रहण करने के 6 महिने के अंदर सदस्य बन सकता है। तभी तो नीतीश कुमार के दूत ने अपना काम शुरू करते हुए नागमणि से सम्पर्क साधते हुए उनके मन को टटोलते हुए चारा डाला दिया है।