आखिर क्याों रुठे हैं शरद यादव कि मनाने से भी नहीं मान रहे?जानिए पूरा सियासी गणित

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पटना Liveडेस्क. बिहार में बीजेपी के साथ सरकार गठन के बाद शरद यादव नाराज हैं. शरद यादव चुप हैं. अपनी पार्टी के लिए तो शरद यादव कुछ नहीं बोल रहे लेकिन विपक्षी पार्टियों के नेताओं के साथ उऩकी मुलाकात जारी है और वो अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर भी कर रहे हैं. विपक्षी पार्टियों को भी लगता है कि शरद यादव साल 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता के बड़े चेहरे साबित हो सकते हैं. इस बीच जानकारी यह भी है कि खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी शरद यादव से फोन पर बात की है, लेकिन वो उनकी नाराजगी दूर करने में सफल नहीं हुए हैं. अब सवाल उठता है कि आखिर शरद यादव इतने नाराज क्यों हैं? क्या वो पार्टी में अपनी घट रही पूछ को लेकर नाराज हैं या फिर वो वाकई विपक्षी एकता को लेकर गंभीर हैं, या वो किसी भी हाल में बीजेपी के साथ नहीं दिखना चाहते हैं. सवाल गंभीर हैं और देखा जाए तो शरद दोनों बातों से नाराज हैं. दरअसल नीतीश कुमार की पार्टी में बढ़ते पैठ के चलते शरद यादव खुद को हाशिए पर खड़ा मानते हैं. नीतीश कुमार ने पिछले साल अक्टूबर में उनसे पार्टी की कमान ले ली थी और खुद पार्टी के अध्यक्ष बन गए थे. नीतीश के इस कदम से सदमे में आए शरद कुछ कर तो नहीं पाए लेकिन इस फैसले ने उनके दिल में गहरे जख्म जरुर दिए जो भरने के बजाए समय-समय पर बढ़ते ही गए लेकिन पार्टी में नीतीश के कद के आगे छोटे शरद यादव कुछ खास कर नहीं सके. इस बीच संसद और संसद के बाहर शरद यादव विपक्षी एकता के बड़े हिमायती के तौर पर उभर कर सामने आए. कांग्रेस के नेतृत्व में उन्होंने सबों को एक साथ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. कई मौकों पर वो बीजेपी और केंद्र सरकार के लिए मुसीबतें खड़ी करते नजर आए. अब ताजा घटनाक्रम में नीतीश कुमार ने बिहार में बीजेपी के साथ सरकार बनाकर एक झटके में ही विपक्षी एकता को धाराशायी कर दिया. शरद यादव को मलाल है कि नीतीश कुमार ने इस फैसले में उनसे सलाह-मशविरा नहीं किया और खुद ही फैसला ले लिया. शरद की ये बातें कुछ हद तक सही भी हैं. एक तो नीतीश कुमार ने उनसे पार्टी अध्यक्ष का पद ले लिया दूसरे महत्वपूर्ण मामलों में भी वो उऩसे सलाह मशविरा करना मुनासिब नहीं समझा. यही कारण है कि शरद यादव के मन में सुलग रहा गुबार फूट पड़ा है और वो खुलकर नीतीश कुमार के विरोध में खड़े हो गए हैं. तमाम विपक्षी नेता उनके गुबार को ठंडा करने की बजाए उसे हवा दे रहे हैं. लालू प्रसाद खुलकर उन्हें अपने पाले में आने का आमंत्रण दे रहे हैं और सामाजिक न्याय का चैंपियन कह रहे हैं. लालू जानते हैं कि अगर शरद यादव नीतीश कुमार से अलग हुए तो नीतीश कमजोर होंगे. लेकिन नीतीश कुमार ने भी नफा-नुकसान को तौलकर ही कदम बढ़ाया है वो बखूबी जानते हैं कि शरद अगर अलग भी हो गए तो उससे जेडीयू को ज्यादा कुछ बिगड़ने वाला नहीं है. सो नीतीश कुमार की प्रतिक्रिया भी ठंडी ही है. शरद यादव ने तेजी से बदले घटनाक्रम पर अभी तक कोई सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है लेकिन जदयू समेत कई विपक्षी नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं. शरद यादव मध्य प्रदेश, गुजरात और केरल के जदयू नेताओं से भी मिले हैं. कहा जा रहा है कि शरद यादव ने इन नेताओं से कहा है कि उन्हें इस फैसले से “काफी तकलीफ” है क्योंकि नीतीश ने ये फैसला ऐसे समय में लिया है जब विपक्षी एकता की सबसे ज्यादा जरूरत थी. लालू यादव के रिश्तेदार और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने भी शरद से बात की है. समाजवादी पार्टी के प्रमुख और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने भी शरद यादव से बात की है.

इस बीच बीजेपी खेमे से भी शरद यादव को मनाने का दौर जारी है. वित्त मंत्री अरुण जेटली और बीजेपी के बिहार प्रभारी धर्मेंद्र यादव से भी शरद की मुलाकात हुई है. माना जा रहा है कि बीजेपी शरद को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने का प्रस्ताव दे रही है.

दूसरी तरफ जदयू के महासचिव केसी त्यागी ने कहा कि पटना में अगले महीने हो रहे पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में सभी नेता खुलकर अपनी बात रख सकेंगे. त्यागी ने कहा कि शरद जी जदयू के संस्थापक अध्यक्ष रहे हैं, वो पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता हैं और उन्हें पूरे सम्मान के साथ बैठक में बुलाया गया है. एक जदयू नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि शरद यादव 19 अगस्त को आयोजित बैठक में शामिल होकर अपनी नाराजगी जाहिर कर सकते हैं. पार्टी के एक अन्य सूत्र ने कहा कि 20 राज्यों के जदयू नेता शरद और नीतीश को पत्र लिखकर अपनी राय रख सकते हैं. पार्टी के एक धड़े का मानना है कि नीतीश 2013 में जिस तरह एनडीए गठबंधन से “जल्बाजी में” अलग हुए थे उसी तरह इस बार शामिल हुए हैं.

फिहलाल शरद यादव चुप हैं और शायद वो अपनी राजनीतिक वजन को तौल रहे हैं. कुछ न बोलकर वो नीतीश कुमार को मैसेज देना चाहते हैं और अपने लिए कुछ ठोस बेहतर भविष्य का वादा चाहते हैं. जाहिर है यह समय भी उनके लिए एक मौका लेकर आया है अगर वो कुछ गोटियां सेट करने में कामयाब रहे तो साल 2020 के बाद भी उनके लिए राजनीति में कुछ बचा रहेगा और अगर उनका यह दांव फेल हो गया तो राजनीति में उनके लिए भविष्य के दरवाजे बंद हो जाएंगे.