बेटी मॅाडर्न लेकिन बहू देसी चाहिए…!

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पटना Live डेस्क । यह कोई कहावत नहीं बल्कि हकीकत है और मामला जुड़ा है बिहार की राजनीति के सिरमौर परिवार से। हम बात कर रहे हैं बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की पत्नी राबड़ी की। मौका था लालू प्रसाद के जन्मदिन की पार्टी का तो जाहिर है हल्के-फुलके मूड में राबड़ी से जब यह पूछा गया कि आखिर कब शादी कर रही हैं अपने दोनों युवराजों की, जो अब प्रदेश के काबीना मंत्री भी हैं। राबड़ी ने कहा कि वो तैयार बैठी हैं और संभावित बहू को ढूढ़ने में जुटी हैं लेकिन मामला इतना आसान नहीं है। मैडम को बहू चाहिए खांटी देसी। बहू वैसी हो जैसी वो हैं। मतलब यह कि पूरी तरह से पारिवारिक हो, सिनेमा और मॉल की शौकीन नहीं हो। तो क्या यह माना जाए कि उन गुणों को वो अपनी बेटियों में नहीं तलाशती हैं और सबसे दिलचस्प है कि बहू ढूढ़ने की जिम्मेदारी भी राबड़ी ने बेटियों को ही दे रखी है। अब सवाल वाजिब है कि बेटियों में राबड़ी जिन गुणों और संस्कारों को नहीं डाल सकीं वो बहुओं में पाना चाहती हैं तो क्या माना जाए कि सिनेमा और मॉल जाने वाली लड़कियों में संस्कार नहीं होते या फिर उनको सम्मान नहीं मिलना चाहिए।

राबड़ी कहती हैं कि उनकी तरह बहू घर के साथ-साथ जरूरत पड़े तो बाहर का भी काम संभाल ले लेकिन मॉड और मॉडर्न नहीं होनी चाहिए। अब सवाल उठता है कि बेनामी संपत्ति और पटना में बन रहे सबसे बड़े मॉल में क्या लड़कियों का जाना प्रतिबंधित होगा। यह सवाल मौजूं है क्योंकि उस कथित मॉल का मालिकाना हक लालू परिवार के नाम पर है। यह माना जा सकता है कि राबड़ी बिना दांव-पेंच की बोल जाती हैं लेकिन कहती तो दिल की हैं। इसे क्या माना जाए कि इस परिवार का बाहरी बदलाव जो हो गया हो लेकिन लालू-राबड़ी परिवार की मानसिकता अभी भी वही है। यह बिहार के लिए अभिशाप है। जो मां-बाप अपने बेटियों में वो संस्कार नहीं दे पाए अब वो उन्हें बहुओं में चाहिए। यह कौन नहीं जानता कि लालू-राबड़ी की सांसद बेटी मीसा एक दिन भी ससुराल में नहीं रही, कथित तौर पर अपने घर को नहीं संभाला और अपने पति शैलेश को जबरदस्ती घरजमाई बना दी। जानने वाले कहते हैं कि शैलेश की लालू के घर और मीसा के सामने कोई वजूद नहीं है और नहीं चाहते हुए भी शैलेश को वहां रहना पड़ता है। भला इस दोहरी मानसिकता में जी रहे परिवार से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं?

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