सीबीआई एडिशनल डायरेक्टर राकेश अस्थाना को देखकर क्यो चिल्लाने लगे थे तात्कालिक रेल मंत्री लालू यादव ? जानिए …

0
12

पटना Live डेस्क। सीबीआई के एडिशनल डायरेक्टर  राकेश अस्थाना के हाथ एक बार फिर लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार की बेनामी संपत्ति और साल 2006 में लालू प्रसाद यादव के रेल मंत्री रहते रेलवे के दो होटलों की नीलामी में गड़बड़ी की जांच की जिम्मेदारी है। सीबीआई के एडिशनल डायरेक्टर राकेश अस्थाना एक बार फिर लालू प्रसाद यादव के लिए मुसीबत बन कर आए हैं। राकेश अस्थाना को लेकर भले ही आपके दिमाग में घंटी न बजती हो लेकिन लालू प्रसाद यादव के समर्थकों के बीच अस्थाना काफी मशहूर हैं।


राकेश अस्थाना इससे पहले भी देश में चर्चित चारा घोटाले की प्रारंभिक जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं. राकेश अस्थाना के सीबीआई में रहते ही लालू प्रसाद यादव पर चारा घोटाले में शिकंजा कसा गया था। वही राकेश अस्थाना एक बार फिर लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के लिए मुसीबत बन कर आए हैं। इस बार लालू की मुसीबत पहले की तुलना में ज्यादा बड़ी नजर आ रही है।


सीबीआई के मुताबकि प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि होटल आवंटन में गड़बड़ियां की गई। होटल लीज पर लेने के बदले जमीन ली गई. 65 लाख में 32 करोड़ की जमीन ली गई। धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के केस में आईपीसी की धारा 420 और 120बी के तहत मामला दर्ज किया गया है।

सीबीआई के एडिशनल डायरेक्टर राकेश अस्थाना ने बताया कि लालू प्रसाद यादव जमीन के लिए होटल देने की शर्तों में ढील दी। जब लालू यादव रेलमंत्री थे तब रेलवे के दो होटलों को आईआरसीटीसी को ट्रांसफर किया गया था और इनकी देखभाल करने के लिए टेंडर इशू किए गए थे  बाद में यह पाया गया कि टेंडर बांटने में गड़बड़ियां हुई हैं।

राकेश अस्थाना और लालू यादव

लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के 12 ठिकाने पर सीबीआई की रेड की मॉनिटरिंग राकेश अस्थाना ही कर रहे है  राकेश अस्थाना लालू प्रसाद यादव के लिए कोई अनजान नाम नहीं हैं। लालू यादव के 1995 में मुख्यमंत्री बनने के बाद की  सीबीआई चारा घोटाले की जांच शुरू कर चुकी थी  राकेश अस्थाना धनबाद में थे और जांच उनके हवाले थी।तब झारखंड अलग राज्य नहीं था। जांच के सिलसिले में अस्थाना और उनके साथी अफसर पटना में लालू से पूछताछ करने पहुंचे. पर लालू यादव से पूछताछ तो दूर मुलाकात संभव नहीं हो पा रही थी।
जाहिर है कि अस्थाना पर तरह-तरह के दबाव पड़े. हथकंडे अपनाए गए।अस्थाना कोलकाता में बैठे संयुक्त निदेशक यू एन विश्वास के चहेते थे।विश्वास ने जांच की लगभग पूरी धारा लालू की संलिप्तता की ओर मोड़ दी।किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि बात क्या है। लालू इस कदर क्यों सामने न आने पर अड़े हुए हैं। पूरा मामला तब साफ हुआ जब किसी नेता के कहने पर बिहार सरकार के एक अफसर ने अस्थाना के एक साथी अफसर से किसी बहाने मुलाकात की। मुलाकात से साफ हुआ कि यादव को दरअसल उनके कुछ समर्थक सीबीआई से मिलने से रोक रहे हैं। लालू के नजदीकी कुछ राष्ट्रीय जनता दल नेता बेहद डरे हुए थे।


उन्होंने सुन रखा था कि सीबीआई पूछताछ के दौरान अस्थाना पीटते हैं।अगर बस इतना ही होता तो गनीमत थी।इन नेताओं ने जाने कहां से यह सुन रखा था कि सीबीआई के अफसर पजामे के अंदर चूहा छोड़ देते हैं और तो और खूब मिर्च वाला खाना खिला कर पानी नहीं देते।जाहिर सी बात थी कि जिस अफसर ने सुना, उसने इन बातों को खारिज किया। राजद नेता को भरोसा दिलाया कि अस्थाना चाहे जितने भी सख्त अफसर हों वे किसी मुख्यमंत्री के साथ तो ऐसा करने की सोच भी नहीं सकते।अस्थाना चाहे लालू प्रसाद यादव से कितनी भी इज्जत से पेश आए हों लेकिन ये भी सच है लालू प्रसाद को चारा घोटाले में जेल का मुंह तो देखना ही पड़ा। चारा घोटाले से बिहार की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई।

अस्थाना 1984 के बैच के गुजरात कैडर के अफसर हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वासपात्र माने जाते हैं। वाजपेयी सरकार आने के बाद अस्थाना गुजरात कैडर वापस चले गए और मनमोहन सिंह सरकार आने के बाद लालू यादव को लगा की अस्थाना रूपी बेताल का पीछा उनसे छूटा।लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था।
रेलमंत्री रहने के दौरान सूरत के पास एक रेल दुर्घटना हुई, लालू यादव बतौर मंत्री स्पॉट पर मुआयना करने पहुंचे। लालू को इस बात का अंदाजा नहीं था कि अस्थाना वहां पुलिस कमिश्नर थे।अचानक अस्थाना को देखकर लालू यादव का पारा चढ़ गया। वे चिल्लाने लगे।इसी बीच कुछ नवयुवकों ने बर्फ के पत्थर जैसे टुकड़े लालू पर फेंके। जाहिर है बर्फ को तो पिघलना ही था।सबूत बचने की तो कोई संभावना थी ही नहीं। लालू घबरा गए और घटनास्थल से भागे। दिल्ली लौट कर उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी हत्या कराना चाहते हैं।
यूपीए सरकार में लालू ने हरसंभव कोशिश की जिससे वे चारा केस से बरी हो जाएं लेकिन ऐसा हुआ नहीं।कई सालों का वनवास काटने के बाद पिछले चुनावों में लालू प्रसाद यादव का समय बहुरा ही था कि अस्थाना फिर हाजिर हो गए।चारा घोटाले की जांच अभी चल रही है और ऊपर से इस बीच मोदी की सरकार आ गई है। अस्थाना दिल्ली में अतिरिक्त निदेशक के पद पर काबिज हो गए। मोदी से नजदीकियों की वजह से सीबीआई में उनकी खासी धाक है ही।

अस्थाना के जिम्मे कई राजनेताओं के जांच की जिम्मेदारी

राकेश अस्थाना के जिम्मे कई राजनेताओं की जांच की जिम्मेदारी है। मसलन मुलायम सिंह यादव, मायावती, ममता बनर्जी और अब लालू प्रसाद यादव और उनके पत्नी और बेटे।गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना के पास इस समय सीबीआई के कई केस हैं, जिसमें से अगस्टा वेस्टलैंड डील और विजय माल्या केस भी मुख्यरूप से शामिल है।
साल 2015 में ही राकेश अस्थाना को मोदी सरकार सीबीआई में एडिशनल डायरेक्टर के रूप में लेकर आई थी।सीबीआई के पूर्व निदेशक अनिल सिन्हा के पिछले साल 2 दिसंबर को रिटायर होने से ठीक पहले राकेश अस्थाना को सीबीआई का इंचार्ज डायरेक्टर बना दिया गया था।

मोदी सरकार ने 1 दिसंबर 2016 की रात को एक चौंकाने वाला निर्णय करते हुए सीबीआई में नंबर 2 रहे स्पेशल डायरेक्टर रूपक कुमार दत्ता को गृमंत्रालय में ट्रांसफर कर दिया था और सीबीआई में ही एडिशनल डायरेक्टर के रूप में काम कर रहे नंबर तीन आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना को इंचार्च डायरेक्टर बना दिया था। जिसको लेकर काफी बवाल मचा था।

साभार -फर्स्ट पोस्ट

Loading...