बड़ी खबर–नैतिकता के आधार पर नीतीश क्यों नहीं दे देते है इस्तीफा? हत्याकांड में नामित है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

साभार – विनायक विजेता, वरिष्ठ पत्रकार

पटना Live डेस्क। 7 जुलाई को रेलवे टेंडर घोटाले में सीबीआई की टीम ने लालू राबडी के पटना स्थित सरकारी आवास 10 सर्कुलर रोड समेत दिल्ली,पटना, रांची, पुरी और गुरुग्राम में 12 जगहों पर छापेमारी की। इस घोटाले के एफआईआर में लालू यादव के छोटे बेटे सह बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव को भी आरोपित किया गया साथ ही छापेमारी के दौरान तेजस्वी से सीबीआई के दस्ते ने घंटों पूछताछ भी इसके बाद सूबे की महागठबंधन सरकार के दलों जदयू और राजद में तलवारें खिंच गई।बयानबाजी का दौर शुरू हो गया।


सीबीआई द्वारा उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर प्राथमिकी दर्ज करने के बाद जदयू द्वारा तेजस्वी से इस्तीफे की मांग को लेकर महागठबंधन में तकरार जारी है। जदयू नैतिकता के आधार पर तेजस्वी से लगातार स्पष्टीकरण देने और इस्तीफे की मांग कर रही है। वही जदयू खुद अपने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जो एक हत्या मामले में आरोपित हैं से नैतिकता के आधार पर इस्तीफे की मांग क्यों नहीं करती?
हत्या का यह मामला बाढ़ से जुड़ा है। नवम्बर 1991 में बिहार में हुए लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में तब बाढ़ संसदीय क्षेत्र में सीताराम सिंह नाम के एक व्यक्ति की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। इस मामले को लेकर तब ढीबर गांव निवासी अशोक सिंह ने नीतीश कुमार सहित कुछ अन्य लोगों पर हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था। 1 सितम्बर 2009 को बाढ़ कोर्ट के तत्कालीन एसीजेएम रंजन कुमार ने इस मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को दोषी पाते हुए उनपर इस मामले में ट्रायल शुरु करने का आदेश जारी किया।
इस मामले पर हंगामा होते ही एक साजिश के तहत तब इस मामले को हाइकोर्ट में स्थानांतरित करा दिया गया और वर्ष 2009 से लेकर अबतक यह मामला हाइकोर्ट में लंबित है। अब सवाल यह है कि सीबीआई द्वारा दर्ज एक एफआईआर के आधार पर जब उपमुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग हो सकती है तो हत्या मामले में आरोपित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नैतिकता के आधार पर सर्वप्रथम अपना इस्तीफा देकर राज्य की जनता को सफाई क्यूं नहीं देते। कोई भी हत्या का मामला कंपाउंडेबल (आपसी समझौता) नहीं होता। आखिर क्या कारण है कि लगभग 16 वर्षों से यह मामला उच्च न्यायालय में लंबित पड़ा है।
नीतीश कुमार को चाहिए कि सर्वप्रथम इस मामले में वह राज्य की जनता को अपनी सफाई दें और उसके बाद ही अपने मंत्रीमंडल के किसी सदस्य को इस्तीफा देने की बात करें। क्योकि अगर बात नैतिकता की है तो यह सामना रूप से सभी पर लागू होता है।