सर पर नमाज़ी टोपी कांधे पर अर्थी जुबा पर “राम नाम सत्य है” और 3 किलोमीटर का सफर

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पटना Live डेस्क। कुछ तस्वीरें आखों से ज्यादा दिल को सुकून देती है। ऐसी ही एक तस्वीर पश्चिम बंगाल के मालदा जिले से खबरो की सुर्खियों में है। इस तस्वीर में  कुछ मुस्लिम लोगों एक हिन्दू की अर्थी को कंधा देते दीख रहे है। इस तस्वीर ने आपसी भाईचारे की मिसाल पेश की है। यहां 35 वर्षीय दिहाड़ी मजदूर बिस्वजीत रजक के पार्थिव शरीर को मुस्लिम लोगों ने कंधा दिया। इतना ही नहीं बल्कि हिंदू रीति-रिवाज के मुताबिक ‘राम नाम सत्य है’ भी बोला। इन्होंने पार्थिव शरीर को 3 किलोमीटर तक अपना कंधा दिया साथ ही अस्थियों को गंगा में बहाकर खुद पानी में डुबकी भी लगाईं।
मकतूल बिस्वजीत का परिवार बेहद गरीब हैं। वह बेटे का अंतिम संस्कार कर पाने में समर्थ नहीं था। बिस्वजीत की मौत लीवर कैंसर के चलते उसके घर में सोमवार को हुई थी। लेकिन जब परिवार मंगलवार को अंतिम संस्कार के लिए इंतजाम नहीं कर पाया तो मुस्लिम ग्रामीणों ने मृतक के पिता नगेन रजक से कहा कि वो पूरे रीति-रिवाज के साथ उन्हें अंतिम संस्कार की अनुमति दें।

इतना ही नहीं स्थानीय मस्जिद के मौलवी भी इस अंतिम संस्कार में शामिल हुए। इसके अलावा मुस्लिम पड़ोसियों ने शोक में डूबे परिवार को अंतिम यात्रा के लिए आर्थिक मदद भी दी। गौरतलब है कि भारत-बांग्लादेश बॉर्डर के बीच बसे इस गांव में 6,000 लोगों के बीच ये सिर्फ दो ही हिंदू परिवार हैं। यह वही जिला है जो कि नकली नोटों और अफीम की खेती के लिए पूरे देश में बदनाम है।

बिस्वजीत के पिता नगेन ने बताया कि ‘बेटे के अंतिम संस्कार के लिए उनके पास ना पैसा था और ना ही लोग। मुझे नहीं मालूम था कि ये सब कैसे होगा। तभी गांववालों ने आगे आकर मदद के लिए हाथ बढ़ाया।’ अंतिम यात्रा का इंतजाम करवाने वाले हाजी अब्दुल खालिक का कहना है कि कोई भी धर्म दूसरों के प्रति नफरत का प्रचार नहीं करता। बिस्वजीत हमारे भाई की तरह था। अगर हम ये सोचते कि ये परिवार किसी और धर्म का अनुयायी है तो अल्लाह हमें कभी माफ नहीं करता। बिस्वजीत अपने पीछे पत्नी और तीन लड़कियों को छोड़ गए हैं। जब वो बीमार थे तो उस दौरान इलाज का खर्चा भी इन्हीं लोगों ने अपने पैसों पर किया था।

बिस्वजीत की पत्नी सरिता का कहना है कि हिंदुओं के अलावा मुस्लिम भाई मदद के लिए आगे आए और वह पार्थिव शरीर को गंगा के पास ले गए। मैंने अपने पति को खो दिया है वहीं मेरे ससुर भी काफी बीमार हैं। ये लोग हमारे साथ मुस्लिम नहीं बल्कि मानव के रूप में खड़े हुए। ताकि मेरे पति की आत्मा को शांति मिल सके। एक स्थानीय शख्स ने बताया कि हम करीब 200 लोग अंतिम संस्कार के लिए पहुंचे। मैंने रामनवमी और मुहर्रम के दौरान झड़पों के बारे में सुना है मगर बिस्वजीत के अंतिम संस्कार में कई मुस्लिम आगे आए।