बिहार में सत्ता का खेल या क्रिकेट का मैच?

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पटना लाइव डेस्क| बिहार में लग रहा है मानो राजनीति नहीं बल्कि क्रिकेट का मैच चल रहा हो. कोई कभी किसी के पाले में गेंद उछालता है तो कभी कोई किसी के पाले में. लेकिन कैच कोई नहीं पकड़ रहा. डर है कि अगर कैच पकड़े तो सरकार जाएगी और सत्ता की मौज भी. वहीं बीजेपी बारहवें खिलाड़ी के तौर पर मैदान के बाहर मजे ले रही है और अपनी बारी का इंतजार कर रही है. लेकिन बीजेपी का इंतजार लंबा हो रहा है. मैदान पर मौजूद खिलाड़ी ही तय नहीं कर पा रहे हैं कि वो कैच पकड़ें या कि फिर छोड़ दें. सोमवार को ही राजद ने एलान कर दिया था कि उसके नेता तेजस्वी किसी कीमत पर इस्तीफा नहीं देंगे और एक तरह से जेडीयू को ये सिग्नल भी दे दिया कि राजद इस मामले में कहीं से भी डिफेंसिव नहीं होगी. बैठक के बाद पार्टी नेताओं के बयान इस बारे में हकीकत बयां कर रहे थे. अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा कि बैठक में तेजस्वी के मसले का तो जिक्र ही नहीं हुआ ये बैठक तो देश की राजनीति और राष्ट्रपति चुनाव को लेकर रखी गयी थी. जो प्रदेश अबतक के सबसे बुरे राजनीतिक संकट से गुजर रहा है और जिसके केंद्र में तेजस्वी यादव हैं, और जिस बात के लिए विधायक दल की बैठक आयोजित की जाती है उसमें हिस्सा लेने वाले राजद नेता कहते है कि तेजस्वी के इस्तीफे की तो बात ही नहीं हुई. जाहिर है राजद ने अपनी तरफ से नीतीश कुमार को जता दिया था कि पार्टी इस मसले पर किसी की नहीं सुनेगी. अब बारी थी जेडीयू की वो इस बारे में क्या सोचते हैं. नीतीश को करीब से जानने वाले लोग कह रहे थे कि वो उसूलों वाले नेता हैं और भ्रष्टाचार पर उनकी नीति जीरो टॉलरेंस वाली है सो वो तेजस्वी को या तो बर्खास्त करेंगे या फिर वो लालू प्रसाद पर दबाव डालकर उससे इस्तीफा दिलवाएंगे. लेकिन जेडीयू की बैठक भी हुई और जो रिजल्ट निकला वो कहीं से नीतीश कुमार की छवि से मेल नहीं खाता. न्याय के साथ विकास का नारे देने वाली सरकार यहां बिल्कुल भी न्याय नहीं कर सकी और गेंद राजद के पाले में फेंक दिया. मतलब हम भी बदनान न हों और काम भी हो जाए. लोग पूछ रहे हैं कि आखिर नीतीश कुमार की छवि को क्या हो गया? क्या वो सत्ता के लिए एडजस्ट करना सीख गए या फिर सत्ता के लिए अपनी सारी नीति को पीछे छोड़ दिया? जेडीयू का प्रेस कॉन्फ्रेंस तो यही कहता है. महज आरोप लगने के चलते जिस नीतीश ने जीतन राम मांझी,रामाधार सिंह और अवधेश कुशवाहा का इस्तीफा लिया आज वो नीति कहां गई. इसके उलट आज नीतीश राजद से कह रहे है कि वो बात का जवाब दे और जनता के सामने तथ्य रखे. लेकिन नीतीश के प्रवक्ताओं के बयान की राजद नेताओं ने हवा निकालने में जरा भी देऱ नहीं की. जेडीयू का आधिकारिक बयान आते ही आरजेडी नेताओं ने एक सुर से उनकी मांगों को खारिज कर दिया. अब सवाल उठता है कि क्या नीतीश इस बात को नहीं जानते थे? तेजस्वी के मामले में आरजेडी उनकी बात नहीं मानेगी क्या इस बात का इल्म नीतीश कुमार को नहीं था? फिर ये चार दिनों की मोहलत और गेंद राजद के पाले में फेंकने की क्या जरुरत थी?
दरअसल नीतीश जानते हैं कि आरजेडी नहीं झुकेगी. सो उन्होंने अपनी छवि बचाने का ही काम किया. लोगों को ये संदेश दिया कि वो भ्रष्टाचार से कोई समझौता नहीं करेंगे, वो भ्रष्टाचार को लेकर कुर्बानी देने को तैयार हैं. अब सवाल है कि क्या चार दिनों की मोहलत पाए तेजस्वी नीतीश की बातों पर गौर करेंगे या राजद एक-एक प्रश्न का जवाब जनता को देगी. राजद नेताओं के बयान से तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता. इन चार दिनों में बिहार की राजनीति हाई वोल्टेज पर रहेगी. राजनीतिक गोटियां सजायी जाएंगी और कोशिश कोई बीच का रास्ता निकालने की होगी. हां, असली सीन तो तब देखने को मिलेगा जब राजनीति की ये गेंद चार दिनों तक हवा में रहने के बाद ये तय होगा कि आखिर इसे पकड़ता कौन है राजद या जेडीयू.