बॉलीवुड के नाम पर भोजपुरी फिल्म बनाना बना इंडस्ट्री में बहस का कारण

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पटना Live डेस्क। भोजपुरी फिल्मो के नाम को लेकर फिल्म इंडस्ट्री में बवाल मच गया है। वैसे देखा जाए तो एक दूसरे फिल्म से स्टोरी, या डायलॉग या फिर फिल्म के नाम को कॉपी कर उसे रि-राइट करना कोई नयी या अनोखी बात नहीं हैं। कई फिल्म हम बड़े परदे पर भी देखते हैं जिसकी पूरी की पूरी कहानी किसी दूसरे फिल्म से उतार ली जाती है। तो फिर ऐसा क्यों है कि घेरे में सिर्फ भोजपुरी फिल्मो को लेकर ही लोग ताने देते नज़र आ रहे है ? जबकि भोजपुरी फिल्म तो फिल्म के नाम के लिए ही बॉलीवुड का सहारा ले रही है। मालुम हो कि बॉलीवुड की कई फिल्मों की पूरी कहानी हॉलीवुड फिल्मों पर बेस्ड रहती है।

क्या है मामला ?
भोजपुरी में बनायीं जाने फिल्मो पर अगर गौर करें तो देखेंगे कि कई फिल्मो के नाम बॉलीवुड की हिट फ़िल्मों या हिट गानों के नाम पर रखा गया है। जबकि बॉलीवुड फ़िल्मों के नाम पर भोजपुरी फ़िल्में बनाना इस बात की गारंटी नहीं है कि भोजपुरी फ़िल्म हिट हो जाएगी।

बॉलीवुड के कई फिल्मो के नाम को री-राइट कर रखा भोजपुरी सिनेमा का नाम , जिनमे से कुछ हैं :

  • ‘करण अर्जुन’ की नक़ल कर नाम रखा ‘आज के करण अर्जुन’
  • ‘राजा हिंदुस्तानी’ फिल्म के नाम से प्रेरित हो कर नाम रख दिया ‘निरहुआ हिंदुस्तानी’
  • ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ के नाम पर टाइटल रखा ‘गैंग आफ़ सिवान’ ।

 


इसके अलावा हाल ही में भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में ‘धड़कन’, ‘ससुराल’ और ‘जिगर’ फिल्में भी रिलीज़ की गयी। जुलाई में ही एक और फ़िल्म रिलीज़ होने की घोषणा की गयी जिसका नाम है ‘शादी कर के फंस गया यार’। गौरतलब है कि ये सारे नाम से बॉलीवुड फिल्में या बॉलीवुड गाने पहले ही निकल चुके हैं। लोगो का इल्ज़ाम है कि सुपरहिट हिंदी फिल्मों के नाम को ही थोड़ा बदल कर, भोजपुरी फिल्में धड़ाधड़ रिलीज़ की जा रही है। उनका अपना कोई क्रिएशन नहीं है।

इन लोगो में हो रही बहस

 

विपक्ष में बोले : वरिष्ठ फिल्म समीक्षक जय मंगल देव ने कहा कि भोजपुरी सिनेमा के लिए ये बहुत ही आसान रास्ता है जिसका उन्होंने चयन किया। बॉलीवुड के स्टार्स पहले ही प्रचार के लिए मेहनत कर देते है और इसका फायदा भोजपुरी फिल्म निर्माता उठा लेते हैं। उनका कहना है कि भोजपुरी फिल्मों की कहानी लिखने वाले लोगों की काबिलियत उतनी नहीं कि वो उनसे अच्छे की उम्मीद की जाए। वे सिर्फ़ री-राइट कर सकते हैं।

पक्ष में बोलें : भोजपुरी फिल्मों के वितरक और अभिनेता रमेश सिंह कहते हैं कि भोजपुरी फ़िल्म वे लोग बना रहे हैं जो भोजपुरी भाषी नहीं हैं। वो गुजराती हैं, बंबई वाले हैं या फिर किसी दूसरे प्रदेश के हैं। वो बिज़नेस करने के लिए फिल्म बना रहे हैं और उनका मकसद सिर्फ पैसा कमाना है। ऐसे में गैर भोजपुरी भाषी लोग अपनी फ़िल्मों के नाम हिन्दी फ़िल्मों से ही लाते हैं , जबकि भोजपुरी हिंदी से कमज़ोर बिल्कुल भी नहीं है।

पक्ष में : भोजपुरी फ़िल्मों में सालों से काम कर रही रानी चटर्जी ने कहा कि , “भोजपुरी फ़िल्में अब ओवरसीज़ मार्केट के लिए बनती हैं तो उस मार्केट को ध्यान में रखकर फ़िल्मों के नाम रखे जाते हैं। अभी फिल्मों के छोटे नाम रखने का ट्रेंड है। इसलिए भोजपुरी सिनेमा ट्रेंड फॉलो करते नज़र आ रहा है। आप दूसरी भाषाओं की इंडस्ट्री देखिए तो वहां पर भी तो अंग्रेज़ी या किसी दूसरी भाषा से नाम लिए जाते हैं। तो फिर इतना हल्ला भोजपुरी पर ही क्यों होता है? ”

भोजपुरी फिल्म के निर्देशक राजकुमार पांडेय का इस बारे में कहना है कि सच्चाई यही है कि तकनीक, अभिनय या बजट किसी भी मोर्चे पर भोजपुरी फिल्में, बॉलीवुड के आस-पास भी नहीं हैं। सिर्फ नाम वहां से ले कर रख लेने से फिल्म सुपरहिट नहीं होती बल्कि एक्सपेक्टेशन ही बढ़ती है। अब देखना दिलचस्प होगा कि भोजपुरी फिल्म नए नाम के साथ परदे पर दस्तक देता है या अब तक जैसा चल रहा वैसे ही चलता रहेगा ?

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