Exclusive(वीडियो औऱ वो FIR ) 22 साल बाद – कहाँ खो गई लालु की संवेदना? अशोक सिंह हत्याकाण्ड में प्रभुनाथ सिंह, भाई और समर्थक संग दोषी करार

पटना Live डेस्क। 22 साल पुराने मशरख के जनता दल के तात्कालिक विधायक अशोक सिंह की नृशंस हत्या में  गुरुवार को राजद के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह समेत तीन लोगों को दोषी करार दिया, जबकि एक अन्य अभियुक्त केदार सिंह को रिहा कर दिया।अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (नवम्) सुरेन्द्र शर्मा ने मामले की सुनवाई के बाद प्रभुनाथ सिंह के अलावा उनके भाई दीनानाथ सिंह और पूर्व मुखिया रितेश सिंह को दोषी करार दिया। फैसले के बाद प्रभुनाथ सिंह के साथ अन्य दोनों दोषियों को न्यायिक हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया। 22 साल बाद इस मामले में 23 मई को सजा सुनायी जाएगी।

मकतूल अशोक सिंह कभी इलाक़े में बाहुबली छवि के सियासतदान प्रभुनाथ सिंह के सहयोगी रहे थे। लेकिन 1991 के लोकसभा चुनाव में वो पीएन सिंह से अलग हो गए और साथ ही जनतादल का झंडा थामकर प्रभुनाथ सिंह के सामने राजनीतिक प्रतिद्वंदी बनकर उभरे। यही वो खुन्नस थी बाद में खूनी शक्ल अख्तियार कर गई और फिर 28 दिसंबर 1991 को मशरख बाजार के जिला परिषद कांप्लेक्स में अशोक पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर उनकी हत्या की कोशिश हुई थी, लेकिन वह एक मकान में छुपकर किसी तरह बच गए थे। ये दौर लालु यादव के उत्थान का था। महराजगंज के अखाड़े में प्रभुनाथ को चित्त करने की कवायद में अशोक सिंह की दमदार उपस्थित को भापते हुए लालु ने उन्हें मशरख में अध्यक्ष मनोनीत करते हुए खुली छूट दे दी। सत्ता का वरदहस्त और इलाके में प्रभुनाथ कुनबे की दबंगई की मुख़ालफ़त ने अशोक को 1995 में बिहार के सारण में मशरख निर्वाचन क्षेत्र से जनता दल से विधायक बनवा दिया। अशोक ने प्रभुनाथ सिंह को चुनावी मैदान में चारोखाने चित्त कर दिया था।मशरख ने अपना नया विधायक चुन लिया था। लेकिन यही जीत उनकी जिंदगी की पहली और आखरी जीत बन गई। अशोक सिंह के भाई तारकेश्वर सिंह ने मीडिया को बताया कि उनके भाई ने 1995 में प्रभुनाथ सिंह को चुनाव में हरा दिया था। इसके बाद प्रभुनाथ ने खुले तौर पर ऐलान किया था कि ” विधायक त बन गईले पर 90 दिन से बेसी ना जिहें”(अशोक सिंह के विधायक बनने के 90 दिनों के भीतर उसकी हत्या कर दी जाएगी)।


और ठीक 90 दिन बाद अशोक सिंह को बिहार की राजधानी पटना के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले क्षेत्र यानी मुख्यमंत्री आवास से महज़ कुछ मीटर की दूरी पर स्टैंड रोड  उनके सरकारी आवास एम-51  में शाम को 7 बजे के आसपास चेहरे पर बम मारकर  मौत की नींद सुला दिया गया जब वो लॉन में बैठे जरूरी काम निपटा कर खड़े हुए और घर के अंदर जाने लगे।

सबसे बड़ी बात यह थी कि बमो के धमाके की आवाज़ तात्कालिक मुख्यमंत्री लालु यादव ने भी अपने सरकारी आवास में सुनी थी और डीएसपी स्तर के एक अधिकारी को पता लगाने खातिर भेजा था। अशोक की हत्या की जानकारी मिलने पर दुःखी मुख्यमंत्री स्वयं पीएमसीएच इमरजेंसी वार्ड पहुचे थे और फिर मौत की पुष्टि के बाद सरकारी आवास अशोक सिंह के परिजनों संग घंटो मौजूद रहकर अपराधियों को पाताल से भी ढूढ़कर सज़ा दिलवाने की बात कह सांत्वना देते रहे थे।

बाद में तकरीबन अशोक सिंह की हत्या के बाद उनकी पत्नी चांदनी देवी ने प्रभुनाथ सिंह और उनके दो भाइयों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कराया था।उन्होंने अपना बयान पीएमसीएच के इमरजेंसी वार्ड में कलमबद्ध कराया था। चांदनी सिंह के बयान पर तब गर्दनीबाग थाना में इस मामले में प्रभुनाथ सिंह,उनके दो भाइयों सहित कुछ अज्ञात लोगों पर भादवि की धारा302, 27आर्म्स एक्ट एवं 3/4 विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत प्राथमिकी(339/ 95) दर्ज करायी गई थी। उस वक्त चुकि सचिवालय थाना अधिकृत थाना नहीं था, इसलिए इस मामले की प्राथमिकी गर्दनीबाग थाने में दर्ज करायी गई थी। 2005 में सचिवालय थाना प्राथमिकी दर्ज करने के लिए अधिकृत हुआ। दिवंगत अशोक सिंह की पत्नी ने तब अपने बयान में कहा था कि घटना के पूर्व हाथ मेंएक झोला लिए एक युवा व्यक्ति उनके आवास पर आया था तथा विधायक जी से मिलनेकी इच्छा जाहिर की थी तब विधायक आवास के अंदर थे। बाहर आने के बाद वो उस व्यक्ति के साथ बात करते हुए लॉन में चले गए। कुछ देर बाद जब बमों के धमाके की आवाज सुनाई पड़ी तो वो घबराकर बाहर निकली जहां उन्होंने अपने पति को लहुलुहान जमीन पर बेसुध पड़ा पाया और झोला लिए व्यक्ति गेट के बाहर की ओर भाग रहा था। उसके साथ उन्होंने प्रभुनाथ सिंह और उनके भाइयों को भी पूर्व और पश्चिम दिशा की ओर भागते देखा था।

अशोक सिंह मामले में गिरफ्तार प्रभुनाथ सिंह के छपरा जेल में रहते कानून व्यवस्था बिगड़ रही थी। जिसके चलते उनको हजारीबाग जेल शिफ्ट किया गया। उस समय झारखंड अलग राज्य नहीं बना था। इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर बिहार से झारखंड की हजारीबाग अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया था।
लेकिन हत्याकाण्ड के बाद सियासत बदली, वक्त बदला, मयार बदला और बदल गया लालु का सियासी मिज़ाज़ भी। अशोक सिंह की हत्या के बाद इंसाफ दिलाने की घोषणा करने वाले लालु ने कालांतर में प्रभुनाथ को अपने दल में शामिल कर लिया और फिर सियासत में उस अल्फ़ाज़ को पुनः सत्य कर दिया कि राजनीति में न कोई दोस्त होता है न कोई रक़ीब होता है बस वक्त के हिसाब से दोस्त और दुश्मन बदलते रहते है।

वही दूसरी तरफ़ अदालत का फैसला आने के बाद दिवंगत विधायक की पत्नी चांदनी देवी ने कहा, आखिर 22 साल बाद ही सही लेकिन हमें न्याय मिल गया। न्यायालय पर पूरा भरोसा था, इसलिए हमने काफी लंबा संघर्ष किया। उन्होंने कहा कि उम्मीद है कि 23 मई को जब अदालत सजा के बिंदु पर फैसला सुनाएगी, तब दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी।