बदलती राजनीति बनता समीकरण….पिछड़ों की राजनीति में सेंध

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पटना Live डेस्क।  राजनीति में हमेशा प्रयोग की संभावना बनी रहती है..शायद इसी वजह से इसे एकेडमिक भाषा में पॅालिटिकल साइंस कहते हैं । 2014 का लोकसभा चुनाव के समय देश ने राजनीति का एक बड़ा प्रयोग देखा। राजीव गांधी की सरकार के बाद देश में पहली बार किसी भी एक राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत मिला। भाजपा ने गठबंधन करने से लेकर सामाजिक राजनीति में भी कई प्रयोग किये। इसी प्रयोग का एक सिरा बिहार की राजनीति से जुड़ता है। पहली बार कुशवाहा राजनीति को तवज्जो देते हुए भाजपा ने बिहार में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के साथ समझौता किया और पिछड़ों की एक ताकतवर जाति को लालू-नीतीश के दायरे से बाहर आने को प्रोत्साहित किया। उत्तर प्रदेश के जनादेश से बम-बम होकर भाजपा, बिहार की राजनीति में नए सिरे से गणित गढ़ने में जुटी है। लोकसभा चुनाव में यहां मिली आशातीत सफलता और फिर विधान सभा में औंधे मुंह गिर जाना इसकी खास वजह मानी जा रही है। जाहिर है भाजपा उन कमियों को दुरुस्त करने में जुट गई है जो  उसके विजय रथ को रोक सकता है। पिछले दिनों बिहार के पूर्व मंत्री और युवा नेता सम्राट चौधरी का भाजपा में शामिल होना भी उसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।

सम्राट चौधरी एक मजबूत राजनीतिक हैसियत वाले परिवार से आते हैं। जाति से कुशवाहा (कोइरी) हैं और युवाओं में खासे लोकप्रिय हैं। लोकप्रियता का कारण है इनकी साफगोई और शीघ्र निर्णय लेने की आदत। अपनी बिरादरी के इतर भी सभी वर्गों में इनकी पकड़ है और काम यदि नीतिगत है तो हर हाल में उसे पूरा करने की जिद पालते हैं सम्राट। यही कारण है कि राजनीतिक पंडित सम्राट को युवा तुर्क की भी उपाधि देते हैं। अब बात करते हैं सूबे की बदलती राजनीतिक तस्वीर की। बिहार की राजनीति में पिछड़ों की बड़ी भूमिका है और इस हिस्से में यादवों के बाद कुशवाहा संख्या बल में दूसरे नम्बर पर हैं। सम्राट चौधरी कहते हैं कि संख्या बल में मजबूत होने के बावजूद कुशवाहा सत्ता के नाम पर हासिए पर है। पिछड़ों के नाम पर राजनीति चमकाने वाले बड़े और छोटे दोनों भाइयों ने कुशवाहा को सत्ता में हिस्सेदारी के नाम पर ठेंगा दिखाने का काम किया है। यह बात बिहार की राजनीति में नई नहीं है। बिहार में पिछड़ों की राजनीति का अलख जगाने के साथ-साथ उन्हें पहली बार एकजुट करने का काम करनेवाले जगदेव प्रसाद भी कुशवाहा बिरादरी से ही आते हैं। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ पिछड़ों की राजनीति में यादव हावी होते गए और कुशवाहा और पिछड़ते चले गए। लालू प्रसाद का उदय और उत्थान को भी इसी नजरिए से देखा जा सकता है। कुल मिलाकर आज के दिन राजनीतिक रूप से कुशवाहा समाज बिहार की राजनीति में अपने आप को ठगा महसूस करता है। वैसे वास्तव में इसके लिए खुद कुशवाहा समाज भी कम जिम्मेदार नहीं है। अब तक इस समाज के नाम पर राजनीति करने वालों में शकुनी चौधरी और जगदेव प्रसाद के बेटे नागमणि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है लेकिन शकुनी राजनीतिक हैसियत रखने के बावजूद व्यावहारिकता में चूक गए तो नागमणि अपनी राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण अपना महत्व खो दिए। नतीजा सामने है। फिलवक्त कुशवाहा के नाम पर राजनीति करने वालों में बड़ा नाम केन्द्रीय मंत्री और रालोसपा के प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा का है लेकिन जनाधारविहीन इनके कद का राजनीति में कोई कद्र करने वाला कोई नहीं है

जाहिर है सम्राट चौधरी के लिए कुशवाहा की राजनीति करने का यह बेहतरीन मौका है और अब भाजपा के पाले में जाकर अपनी मंशा भी स्पष्ट कर दी है। सम्राट कहते भी हैं कि संख्या बल के आधार पर सत्ता में उनकी हिस्सेदारी होनी चाहिए। कुशवाहा अब किसी के पिछलग्गु नहीं बनेंगे। भाजपा भी पिछड़ों और अतिपिछड़ों को टारगेट करते हुए उत्तरप्रदेश के समीकरण और विजय को दुहराने के लिए बेताब दिख रही है।