तैश में तेजस्वी,तो नीतीश हैं नरम!

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सीबीआई की छापेमारी और तेजस्वी यादव के खिलाफ केस के बाद लालू परिवार का राजनीतिक अस्तित्व दांव पर लगा है. छापेमारी के बाद निगाहें अब नीतीश कुमार पर हैं कि वो आखिर तेजस्वी यादव को लेकर क्या फैसला लेते हैं. लेकिन इस्तीफे  को लेकर तेजस्वी तैश में हैं और उन्होंने साफ कहा है कि वो इस्तीफा देने नहीं जा रहे. इसके लिए वो केंद्र सरकार में मंत्री उमा भारती का उदारहरण देकर केंद्र सरकार पर दोहरे मापदंड का आरोप लगा रहे हैं. जाहिर है उनका तर्क भी अपनी जगह ठीक है. कारण है कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी उमा भारती केंद्र में मंत्री बनी हुई हैं और इसी बात को तेजस्वी और उनकी पार्टी राजद आधार बना रहे हैं. इस्तीफा देना या न देना अब राजनीति सुचिता से जुड़ा है. सारे प्रकरण को साल 2008 में उठाने वाले शिवानंद तिवारी आज लालू प्रसाद के सबसे बड़े हिमायती बने हुए हैं. जाहिर है राजनीति अपने नफा-नुकसान से तय होता है सो शिवानंद तिवारी इस बात को बखूबी जान रहे होंगे. बड़ा सवाल तेजस्वी के मंत्रिमंडल में बने रहने को लेकर है. लालू आवास पर उमड़ा कार्यकर्ताओं का हुजूम तेजस्वी को नैतिक बल दे रहा है इसमें भी कोई दो राय नहीं है. शायद यही कारण है कि तेजस्वी ने अपने इस्तीफे को सिरे से खारिज कर दिया है. अपने नेताओं पर मुकदमे को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं की भावना को समझा जा सकता है,लेकिन राजनीति भावनाओं से नहीं चलती इसमें ठोस निर्णय लेना पड़ता है. फैसला नीतीश कुमार को लेना है. लेकिन वो इतना आसान भी नहीं है. वो बखूबी जानते हैं कि अगर फैसला लिया तो सरकार संकट में पड़ जाएगी और अगर कोई ठोस फैसला नहीं लिया तो उनकी भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति पर सवाल उठेंगे और उनकी व्यक्तिगत छवि को गहरा धक्का लगेगा. नीतीश कुमार अजीब सी राजनीतिक भंवर में फंसे हैं जहां डूबना तो आसान है लेकिन निकलना उससे ज्यादा मुश्किल है.

फिलहाल नीतीश कुमार के पास तीन विक्ल्प हो सकते हैं. पहला ये कि या तो वो तेजस्वी यादव को मंत्रिमंडल से बर्खास्त करें, जो कि आसान नहीं है, दूसरा ये कि वो लालू प्रसाद पर दबाव डालकर तेजस्वी को इस्तीफे के लिए कह सकते हैं, जिसकी संभावना बहुत कम लगती है. और तीसरी ये कि वो चार्जशीट फाइल होने तक का इंतजार करें,जिसकी संभावना ज्यादा नजर आती है. वैसे नीतीश कुमार ऐसे मामलों में ठोस फैसले लेने वाले राजनेता के तौर पर जाने जाते हैं. उदाहरण सबके सामने है जब साल 2005 में अपनी पहली सरकार में नीतीश कुमार ने एक ऐसे ही मामले में सरकार के प्रमुख मंत्री जीतनराम मांझी को रात के दस बजे अपने आवास पर बुलाकर इस्तीफा ले लिया था. उस समय आरोप लगने के बाद निगरानी ने मांझी के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर दिया था. इसी तरह दो और मंत्रियों की भी छुट्टी नीतीश ने ऐसे मामले में कर दी थी. तत्कालीन परिवहन राज्य मंत्री रामानंद सिंह और सहकारिता मंत्री रामाधार सिंह को ऐसे ही हालात में इस्तीफा देना पड़ा था. लेकिन राजनीतिक के इस बदले मिजाज में तेजस्वी को डिप्टी सीएम पद से हटाना नीतीश कुमार के लिए आसान नहीं होगा. कारण साफ है उस समय जेडीयू गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी थी और बीजेपी संख्या बल में उससे कम थी. इस समय सत्तासीन रहते हुए भी जेडीयू का संख्या बल राजद से कम है इसलिए नीतीश कुमार का कोई भी कदम सरकार पर गंभीर संकट खड़े कर सकता है.

बहरहाल,चार्जशीट दाखिल होने तक तेजस्वी मंत्री पद पर बने रहने का मौका मिल सकता है,लेकिन वो बहुत लंबा नहीं होगा. कारण है कि सीबीआई की कार्यप्रणाली के मुताबिक एफआईआर दर्ज करने से पहले चार्जशीट दाखिल करने लायक सबूत जुटा लिए जाते हैं.

निगाहें नीतीश कुमार की तरफ हैं. राजनीति अनिश्चितताओं का खेल है,कौन कब किसके साथ जुड़ता है ये कहना मुश्किल है. वैसे अगर तेजस्वी को बर्खास्त करने के फैसले से नीतीश सरकार पर खतरा आता भी है तो बीजेपी सरकार को समर्थन देने के लिए आगे आ सकती है.